मंगलवार, जनवरी 06, 2026

दो कविताएं


 दो कविताएं

1. पाखण्ड
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
देवी-देवताओं की गणना हज़ार है,
बारी-बारी से ये पा रहे सत्कार हैं।
​जीवित देवों को कोई पूजे ना,
घर में बूढ़ों को कोई पूछे ना।
तड़पें दादा-दादी एक घूँट पानी को,
पति भी न रोक सके पत्नी की मनमानी को।
​पत्थर की मूरत कर रही शृंगार है,
मात-पिता का होवे ना सत्कार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​सबका अपना-अपना यह उद्योग है,
मंदिर की मूर्ति करे सुख-भोग है।
पाखंडों का दरबार सजाएँ फूलों से,
माखन-मिश्री, दाख चखाएँ झूलों से।
​इन पर न शिक्षा का असर है,
आडंबर में भूल गए संसार हैं।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​मुर्गे व पशुओं को काट रहे कुर्बानी में,
मुर्दे को भी दान देते नादानी में।
अंधविश्वास पनपता इनकी दीवानगी में,
बने रहें पिछलग्गू आना-जानी में।
​पाखंड ने मिटाया संस्कार है,
सहोदर भाव जगाए शुभ आचार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।

 2. शिक्षा का सार

​पढ़ाई न हो तो यह जीवन बेकार,
ज्यों उजाले बिना ऊँचा महल बेकार।
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार,
ज्यों सलिला (जल) बिन ताल-सरिता निस्सार।
​अक्लमंदी बिना सकल जीवन दुश्वार,
साक्षरता बिन जीवन जाए मच्छर सा मार।
पशु तुल्य जीवन बने बिना शिक्षा के यार,
अक्षर-दीपक से महके यह सकल संसार।
​ज्यों भानु-उदय से अंधेरा हो फरार,
निरक्षरता का यदि छाया रहे अंधकार।
ना हो जीवन सुखी, पड़े आपद की मार,
ज्ञान-दीप की लौ जले जब मन में अपार।
महके तब जीवन में खुशियाँ साकार,
चौतरफा विकास ही शिक्षा का है सार।
सुख चाहो अगर, करो शिक्षा से प्यार,
सूर, तुलसी, कबीरा हुए अमर संसार।
​शिक्षा ही खोलती सफलता का द्वार,
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार।
अशिक्षा के कारण आई फिरंगी सरकार,
जैसे ही शिक्षा जगी, देश हुआ वापस हमार।
​शिक्षा का पाया न कोई भी पार,
अगर शिक्षा सधी, तो सधा सारा संसार।
शिक्षा बिना न मिले मान, गौरव और प्यार,
सहोदर कहे—पढ़ना ही है जीवन का सार।


कलमकार 
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राम सहोदर पटेल, "शिक्षक" 
हाई स्कूल नगनौडी संकुल -आमडीह, जिला - शहडोल, मध्यप्रदेश।


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