लड़ाकू महिला का हृदयपरिवर्तन: श्री रामसहोदर पटेल
लड़ाकू महिला का हृदयपरिवर्तन
रामपुर नामक गाँव में एक फुलझड़ी नाम की महिला थी। नाम के अनुसार उसके मुख से फूल से सुन्दर वाणी झड़नी चाहिए लेकिन नाम के विपरीत उसका स्वभाव था। वह जरा सी बात में गुस्सा करती और जो भी महिला पुरुष सामने मिल जाय वह छोटे-बड़े का ध्यान दिये बिना बेतहाशा लड़ती। जब वह लड़ने लगती तब शब्दों के सारे सीमा लाघ जाती थी। उसके जेहन में गालियों की इतनी विशाल शब्दकोष थी जो कभी खत्म ही नहीं होती थी। सुबह से गाली-गलौज शुरू करती तो शाम हो जाती किन्तु वह न तो थकती और न ही उसके गालियों के भण्डार खत्म होते थे। गनीमत थी कि वह किसी को भी नहीं छोड़ती थी, सभी से बराबर लड़ती रहती थी। बिना लड़े उसका भोजन ही हजम नहीं होता था।
सारे गाँव के लोग फुलझड़ी से त्रस्त हो चुके थे। जो भी सामने से गुजरता उससे बेवजह लड़ाई छेड़ लेती, समय बर्बाद कर देती, काम नुकसान कर देती। कोई भी उससे बचकर अपने काम में नहीं जा पाता था।
एक दिन गाँव के भले लोगों ने आपस में मशविरा किया कि गाँव की पंचायत बुलायी जाय और फुलझड़ी को भी उस पंचायत में बुलाकर कोई निर्णय लिया जाय जिससे इसके लड़ाई से छुटकारा मिले।
दूसरे ही दिन सारा गाँव जुट गया, फुलझड़ी भी पंचायत में उपस्थित थी। पंचायत में मुखिया जी ने फुलझड़ी से कहा — "यह पंचायत तुम्हारे लिये बुलायी गयी है। शिकायत है कि तुम प्रतिदिन हर किसी से झगड़ा करती रहती हो। यह बात सही नहीं है। पंचायत का कहना है कि तुम बेवजह लड़ाई-झगड़ा बंद करो, अन्यथा पंचायत के द्वारा तुम्हें दण्ड दिया जायेगा।" मुखिया की बात सुनकर फुलझड़ी बोली — "देखिये मुखिया जी! लड़ना मेरी आदत है, वह मेरा स्वभाव है। बिना लड़े मेरा दाना ही हजम नहीं होता है। इसलिये मेरा लड़ना तो बंद नहीं हो सकता।"
फुलझड़ी की कुवृत्तियुक्त बात सुनकर मुखिया जी बोले — "लड़ना तुम्हारे स्वभाव में है तो तुम्हें लड़ने का अवसर प्रदान किया जाता है। आज के बाद गाँव के प्रत्येक घर से बारी-बारी से एक व्यक्ति तुमसे लड़ने आयेगा। जो महिला या पुरुष सुबह तुम्हारे पास आकर कहे कि लड़ाई शुरू करो,उसी से तुम जी भरकर लड़ोगी। आज के बाद हर किसी से लड़ना बंद करना होगा।" पंचायत के निर्णय को फुलझड़ी ने स्वीकार कर लिया।
दूसरे ही दिन पारी लगा दी गयी और प्रत्येक घर से एक-एक महिला फुलझड़ी से लड़ने जाती। पूरे दिन लड़ने के बाद शाम को घर लौट कर आती। यह सिलसिला अनवरत चल रहा था।
उसी गाँव के दूसरे मुहल्ले में एक नयी बहू कुछ ही दिन पहले ब्याह होकर आयी थी। उस दिन लड़ाई में जाने की उसी घर की बारी थी। सुबह से ही तैयारी शुरू, सास ने कहा — "बहू आज लड़ाई में जाना है, जल्दी से भोजन बनाओ।" लड़ाई में जाना है, सास की बात बहू के समझ में नहीं आई। उसने आश्चर्य से पूछा- मैं समझी नहीं।तब सासू माँ ने सारी बात बहू को समझाया। पूरी बात समझते ही सुचिता बहू ने कहा — "माँ तब तो उस फुलझड़ी से लड़ने मैं जाऊँगी।" सासू माँ बोली — "नहीं बहू, तू अभी नयी-नवेली है, किसी से जान न पहचान। तू वहाँ कहाँ जायेगी? फिर तुमसे लड़ते भी क्या बनेगा?" किन्तु सुचिता ने एक न मानी, सुचिता के दृढ़तापूर्ण बात को सुन सासू माँ उसे रोक न पायी।
नयी-नवेली सुचिता आज फुलझड़ी का सामना करने के लिये तैयार थी। किन्तु सुचिता को नयी नवेली देखते ही जरा सहमी , किन्तु सुचिता ने जब कहा कि "आज आपसे सामना करने की मेरी ही बारी है", यह कह सुचिता ने गहरी मुस्कान भरी तिरछी नजर के वाण चला दिया। यह देखते ही फुलझड़ी का गुस्सा आसमान छू लिया। और आत्मा को चुभने वाले कटीले शब्दों के बाण चलाना शुरू किया — कलमुही, सुअर की बच्ची, काली नागिन, चुड़ैल, डाइन, भूतनी, राक्षसी आदि गालियों का पिटारा खोल दिया। फुलझड़िया के लाख गाली बकने के बाद भी सुचिता स्तब्ध और शांत रहती। तब फुलझड़ी कहती -कुलक्षणी जब लड़ने आई है तो लड़ती क्यों नहीं। उसके हजारों फूहड़ देने के बाद भी सुचिता के अवाक रहने पर फुलझड़ी भी ठण्डा पड़ने लगती तब सुचिता घूँघट से मुखड़ा दिखाती, नजरें तिरछी मारती और गहरी मुस्कान दिखाती जिससे फुलझड़ी गुस्से से लाल-पीला हो जाती और जोरों से गालियां देने लगती। घण्टों गालियां देने के बाद भी सुचिता शांत रहती, उसके किसी भी शब्द का जवाब न देती। और जब फुलझड़ी शांत पड़ने लगती तब सुचिता घूँघट उठाकर वही क्रिया दोहराती जिससे उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चला जाता, पुनः गालियाँ तेज कर देती!
दोनों के बीच यह प्रतिक्रिया पूरी दिन चली। दिवस का अवसान होने को आया तब फुलझड़ी ने अपनी हार स्वीकारते हुए सुचिता से कहा — "बेटी आपकी सहनशीलता और नम्रता के भाव ने मेरा हृदयपरिवर्तन कर दिया। जा चुड़ैलआज से मैं संकल्प लेती हूँ कि मैं अब किसी पर न गुस्सा करूँगी और न ही कड़वे वचन बोलूँगी, न किसी से लड़ूँगी।"
प्रेरणा:
इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि विनम्रता, सहनशीलता और सहजता के द्वारा पत्थर दिल को भी बदला जा सकता है।
कहानीकार:
राम सहोदर पटेल ('पूर्व शिक्षक')
ग्राम - सनौसी, पो. - खड्डा, वाया - ब्योहारी, जि. - शहडोल (मध्य प्रदेश)
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