एक समझ : श्री राम सहोदर पटेल

— एक समझ —

दिनांक: 15/10/2022

समझदारों की समझ जब, समझ से बेसमझ हो जाती है॥
मानो तब तो समाज का, जनाज़ा ही निकल जाती है।

समझ तेरे को देख लगा, ज्यों नासमझों का ही राज है॥
तुम्हारे रुतबे से यों लगा, जहांन का तू ही सरताज है।

करते प्रार्थना निज देश-जाति में बलिदान होने का।
मौका तलाशते समाज की किडनी निकाल लेने का॥

शेखी बघारते-बघारते तुम, मर्यादा ही डकार बैठे।
समाज को कुछ दिया तो नहीं, उलटे झोली ही फाड़ बैठे॥

अरे! स्वयं को समझदार कहने वाला मूर्ख ही होता है।
बुजुर्गों का अपमान करने वाला, कोई धूर्त ही होता है॥

अपने को सुयोग्य कहने वाला, द्वापर का कंस था।
जिसने पिता की गद्दी छीन, दिया जेल का डंस था॥

अपना उल्लू साधने वालों, जरा भी तो समझो।
जिसको तुम अपमानित करते, वही असली हंस था॥

यह अहंकार तुम्हारा, कब तक साथ देगा तुझे।
एक दिन समझ आयेगी कि, तुममें न समझदारी का अंश था॥

समझदार वह है जिसका, दूसरे ही करें गुणगान हैं।
स्वयं को समझदार कहने वाला, तो राक्षसों का ही वंश था॥

हुल्लड़ की भाषा बोल, नहीं बन पाया कोई सुबक्ता।
सुर समाज प्रीत किये बिन, गिनती होय कुबक्ता॥

अहंकारी का अहंकार स्वयं, गर्त में ही गिरा देता है।
समझ आती है तब जब, स्वयं का नाम डुबा देता है॥

अरे! खाते जिस थाल में, क्यों छेद उसी पर करते हो।
जनम ली गोद में जिसके, उसी का मुर्दाबाद करते हो॥

अभी भी समझ जा, समाज का हर तिनका महान होता है।
जो समाज का कद्र न जाने, वह महा हैवान होता है॥

करे सम्मान जो सबका, वही विद्वान होता है।
अखाड़े का लतमार ही एक दिन बड़ा पहलवान होता है॥

रख सहोदर भाव सबसे, जिससे स्वयं का मान होता है।
परस्पर मेल-जोल रखने से, सुखी सारा जहान होता है॥

— कलमकार —
राम सहोदर पटेल (पूर्व शिक्षक)
ग्राम सनौसी, पोस्ट खड्डा, वाया ब्यौहारी,
जिला शहडोल, मध्यप्रदेश
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टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
अति सुन्दर प्रस्तुति महोदय,

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