बुधवार, जनवरी 26, 2022

आजादी के बाद का संघर्ष : प्रदीप

ऐसा नही है कि आज़ादी जीत ली
और संघर्ष करने को कुछ नही है

भारत एक लोकतंत्र बन गया
और बनाने को कुछ नही है

संविधान मिल गया 
और पाने को कुछ नही है

जो जीता गया है
उसे बचाये रखने का संघर्ष अभी भी है

जो बन गया है
उसे बनाये रखने की जिम्मेदारी अभी भी है

जो अथक प्रयासों से मिला है
उसे संजोये रखने की संकल्पना अभी भी है

क्योंकि सभी के प्रतिनिधित्व पर 
एकाधिकारवाद का षणयंत्र अभी भी है

लोकतंत्र को भीड़तंत्र से खतरा अभी भी है
संविधान पर रूढ़िवादियों की टेढ़ी नजर अभी भी है

ऐसा नही है कि आजादी जीत ली 
और संघर्ष करने को कुछ नही है

क्योंकि जीवन स्वयं में एक युद्ध सा है
इसलिए संघर्ष करने को बहुत कुछ अभी भी है।

-ई. प्रदीप 
उकसा, ब्योहारी
निवर्तमान- नागपुर, महाराष्ट्र

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रविवार, जुलाई 18, 2021

कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी



कोविड-19:तीसरी लहर की सुबगुबाहट और हम- आप-डा. ओ. पी.चौधरी
             किसी ने ठीक ही लिखा है कि जिंदगी कर्कश अनुभवों का पहाड़ होती है।अलग बात है कि इस पहाड़ पर कहीं कहीं सुख के कुछ सुकोमल डूब भी उग जाते हैं। सुख की इन्हीं चंद दूबों की चाहत में उम्र बीत जाती है।ऐसा ही है वर्तमान समय जब हम महामारी से जूझते हुए,अपनों को खोते हुए भी साहस और धैर्य जीवन के प्रति रखते हुए आशा की किरण खोजने में लगे हुए हैं। कोविड का पहला मरीज जनवरी 2020 में केरल में पहचान में आया,फिर तो मार्च,20 से लॉक डाउन की स्थिति और संक्रमितों की संख्या बढ़ने का सिलसिला,उसी दौरान महानगरों से कामगारों का अपने गांव घर जल्दी से पहुंचने की जो आपाधापी हुई वह महामारी से भी ज्यादा भयावह।ऐसी भागदौड़ देश के विभाजन के समय रही होगी।उसके बाद का यह मंजर तो बहुत खौफनाक था।समय बीता, महामारी की रफ्तार सुस्त पड़ते ही लोगों की जिंदगी अपने पुराने ढर्रे की ओर अग्रसर ही हो रही थी,कामगार पुनः अपने काम की तलाश में शहरों की ओर वापस जा ही रहे थे,कुछ पहुंच भी गए थे कि तब तक दूसरी लहर का प्रचंड रूप से प्रकट हो जाना,प्रलय के समान ही हो गया। लोक और तंत्र दोनों मस्त थे और आत्ममुग्ध होकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि मित्रों दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम हानि भारत में हुई। लेकिन दूसरी लहर ने बहुत ही भयावह स्थिति पैदा कर दी, सरकारी प्रबंध की कलई खोलकर रख दिया।ऑक्सीजन के लिए लोग पागलों की तरह घूम रहे थे। मरीज बेड की तलाश में अस्पताल में और परिजन दवाओं और ऑक्सीजन की तलाश में बाजार में। लाशों का अंबार लग गया, मनमाने दाम पर लोग परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए मुंहमांगी कीमत चुकाने को तैयार ही नहीं हुए बल्कि अंतिम संस्कार किए।कुछ को तो,सरकारी अधिकारियों ने जेसीबी की सहायता से गंगा में उतराये शवों को गंगा किनारे दबा दिया,जिसका वीडियो सभी ने देखा।मरने के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं हो सका।मुखाग्नि क्या दो मन लकड़ी की चिता भी नहीं मुअस्सर हुई। इतनी पीड़ा और बेबसी कभी नहीं दिखी।हमारी पूरी मशीनरी उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में व्यस्त थी,जनता भी उसी में मस्त थी,मरीज और परिजन बेहाल थे,लेकिन मजबूर और बेबस थे।पांच राज्यों के विधान सभाओं ने भी आग में घी का काम किया।मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी कि इन मौतों के पीछे "चुनाव आयोग अकेले जिम्मेदार है",उसके ऊपर हत्या का मुकदमा चलाया जा सकता है, काबिले गौर है।ठीक उसी राह पर योगी जी का हठ योग कि कावंड यात्रा आयोजित की जाएगी और बार बार उत्तराखंड के नव नियुक्त मुख्यमंत्री जी को भी कावड़ के लिए तैयार करने का प्रयास किसी तुगलकी फरमान से कमतर नहीं दिखता।ऐसे समय में जब अभी काशी दौरे पर आए मा प्रधानमंत्री जी ने तीसरी लहर के आगमन से लोगों को सचेत और ढिलाई न बरतने का साफ साफ संदेश उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री जी के समक्ष दिया।उन्होंने कहा कि देश आज ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां तीसरी लहर की आशंका लगातार जताई जा रही है।लेकिन कावड़ यात्रा में युवाओं का बहुत बड़ा समूह आता है,भगवा परिधान ही नहीं बल्कि कावड़ व लोटा जिसमें गंगाजल भरते हैं,वह भी बहंगी समेत उसी रंग में रहता है।उससे एक परिवेश निर्मित होगा,जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रदेश में आसन्न चुनाव में एक बड़ा वोट बैंक साबित होगा।कुल मिलाकर लोक की चिंता कम,तंत्र की ज्यादा।यह स्थिति बहुत भयावह होगी।भला हो मा उच्चतम न्यायालय का जिसने स्वत:संज्ञान लेकर कावड़ यात्रा के संबंध में सरकार से अपनी स्थिति को 19 जुलाई तक स्पष्ट करने के साथ ही यह भी पीठ ने कह दिया कि यदि सरकार फैसला लेती है तो ठीक है नहीं तो हम आदेश देंगे।ऐसी कड़ी टिप्पणी मा न्यायालयों को क्यों करनी पड़ रही है,क्या यह कहीं न कहीं से सरकारों का जनता के हित व उनके कल्याण से अनदेखी तो नहीं है?आम जनमानस के स्वास्थ्य और जान माल का ख्याल नही है?इस पर हमें विचार करना चाहिए।भारतीय संस्कृति की सम्यक विकास की अवधारणा रही है वह स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए मानव के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित करे।किसी समाज को सभ्य तभी कहा जा सकता है या कोई देश तभी प्रतिष्ठित कहलाता है,जब उसका सर्वांगीण विकास हो।हमें तो ऐसा लगता है कि अपनी अपनी आस्था को कायम रखते हुए घर पर अपना कार्य करते हुए, सुरक्षित रहते हुए अपने आराध्य का ध्यान पूजन करें।अपना कार्य करना भी इबादत ही है।शास्त्रों में कहा गया है कि कर्म ही पूजा है।सरकार को भी पूरा ध्यान टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने पर अपना ध्यान पूरी मुस्तैदी से केंद्रित करते हुए,शिक्षा संस्थाओं के संचालन को सुगम और सफल बनाने में अपनी पूरी शक्ति लगानी चाहिए।
(आलेख  में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं.ब्लॉगर टीम का सहमत होना आवश्यक नहीं)
      डा ओ पी चौधरी
समन्वयक,अवध परिषद उत्तर प्रदेश;
संरक्षक, अवधी खबर,सम्प्रति एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग, श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।
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शनिवार, जुलाई 17, 2021

अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर गीतिका छंद में कविता


(अशोक त्रिपाठी "माधव" की बारिश पर कविता)
Ashok Tripathi "Madhav" ki Barish par Kavita)
आधार छंद-गीतिका

नहीं बरसना था तो बादल 
क्यूँ निकले थे घर से।
कृषि कर्षक सब जीव जगत के
बूँद-बूँद को तरसे।।

जेठ मास में कीच मचाया,
आर्द्रा में नहिं बूँद गिराया।
उमस कड़ी गर्मी दम तोड़े 
बरसो तो मन हरषे।।

घर के अन्न खेत में पहुँचे,
खाली हुए भँडारे।
अब तो रहम करो हे बादल,
मिटे गरीबी सर से।।

देर हुई सब नाश करो मत,
इतना मत तड़पाओ।
उबरे नहीं अभी कोविड से,
तुम उधेड़ते चरसे।।

बिन पानी के जग है सूना,
मुश्किल जीवन जीना।
पुनर्वसु ने बहुत रुलाया,
पुख्ख सुख्ख से बरसे।।

लाज रखो निज जलद नाम का,
माधव विनती करता।
टूट चुका मानव मानो तुम,
अब भीतर बाहर से।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
शहडोल मध्यप्रदेश
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बरसि जई घनस्याम: अशोक त्रिपाठी "माधव"

(अशोक त्रिपाठी 'माधव' की बारिश पर बघेली कविता)
(Ashok Tripathi 'Madhav' ki baarish par bagheli kavita)

बरसि जई घनस्याम

जेठ मास मा चहला कीन्हेन,किहेन असाढ़े घाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

दिहेन खेत मा खादा करसी,
तबहूँ घाम उधेरिसि चरसी।
फेकेन खेते अन्न घरे कय,
सोचे रहेन जो थोरौ बरसी।
लटे लम्मरे कइसौ-मइसौ
जइहीं बिजहा जाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अरहर उरदा तिली बोबायन।
सोयाबीन मूँग छिटबायन।।
खादि खितिर चउगिरदा बागेन।
तबहूँ भरे मा निन्चय पायन।।
कोटेदार सेल्समैनन से,
कीन्हेन ताम-झड़ाम।।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

जब ते जनबुध भये रहेन ते।
जेतना जोरे धये रहेन ते।
कुछ लड़िकन के खाता माहीं,
फिक्स-डिपाजिट कये रहेन ते।
सगला खरच दिहेन बिजहा मा,
बचा न एकौ दाम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अद्रा मा नहिं बूँद गिराया।
पुनरबसू मा खूब तिपाया।
थरहे रहेन धान बंधी मा,
ओहू का खुब नगदि जराया।
त्राहि मची है चारिउ कइती,
रोट लेबाला सबै चढ़ायन,
तबौ किहा नहिं काम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अब ता चिरई लीलय काँकर।
परा हबय किसमत मा पाथर।
माधव मरै बिपति के मारे,
मरे जात हें गोरुअउ राकर।।
सगले लड़िका खटिआ पकड़े,
दीदिउ हबय बेराम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

बिनती सुनी रहम कइ देई।
धरती का शीतल कइ देई।
बरसि के सबके जान बचाई,
पुनि के चकाचक्क कइ देई।।
जब तक जिअब करब नित पूजा।
हे सीता पति राम।
आय के बरसि जई घनस्याम।।

अशोक त्रिपाठी "माधव"
 शहडोल मध्यप्रदेश
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