रविवार, अगस्त 02, 2020

मनभावन सावन (सवैया) -डी.ए.प्रकाश खाण्डे


मनभावन सावन 

सावन तो मनभावन पावन,
मास अवै सब तो सुख पायो
वारिस की सब बूंद सुहावन,
ताल सरोवर मान बढ़ायो
नागन दूध पिलावत हैं सब,
पेड़ लगे धरती हरियायो
साजन राह तकै विरही मन,
धान किसान खूब लगायो ||

शीतल वायु बहे चंहु ओरन,
मान बढ़ावत सावन भायो 
बादल घोर गुहार करे तब,
मोर धरा पर नाच दिखायो 
गाँव गली सब बालक खेलत,
कानन में खग धूम मचायो 
खेत किसान गयो तब पावत,
हालत डोलत धान सुहायो ||

घास अपार उगे धरनी पर,
खूब दिखे सब बादर पानी 
पादप नीर वयार बढे शुभ,
झूम उठे धरती पर प्राणी |
सूरज ऊगत बात करैं सब,
सावन खीर सबै घर जानी |
जीयत के सब सावन पावन,
खेलत खात कटे जिंदगानी ||

मोर मयागुर बात सुनो सब,
सावन के कजली मिल जाई |
रीति-रिवाज मनावत हैं सब,
राग रक्षाबंध बाँधत भाई |
जीवन में सुख आवत जावत,
प्रेम सबै जन पावत आई |
सावन पावन है मनभावन,
देख प्रकाश करेन लिखाई ||

काव्य रचना:-

डी.ए.प्रकाश खाण्डे
शासकीय कन्या शिक्षा परिसर पुष्पराजगढ़,अनूपपुर मध्यप्रदेश

वक्त (कविता): बी एस कुशराम


वक्त (कविता)

वक्त बड़ा बलवान हैयह तो बहुत महान है।

वक्त की धारा जो अपनाता,वहीं खरा इंसान है।।

सुख में हंसाता दुख में रुलातावक्त वक्त की बात है,

वक्त चक्र तो चलता रहतावक्त सदा गतिमान है।वक्त की---।

वक्त से होता ऋतु परिवर्तनवक्त से ही दिन रात है,

बीता वक्त बहुरि ना आतावक्त की महिमा महान है। वक्त की-----।

बालापन यौवन बुढ़ापा,वक्त ही तो बताता है,

जीवन चक्र वक्त भरोसेकहते सभी सुजान है। वक्त की-----।

वक्त भला है वक्त बुरा हैवक्त ये देता परिचय है,

अच्छा बुरा तो आता रहतावक्त चक्र गतिमान है। वक्त की-----।

व्यर्थ गंवाओ नहीं वक्त को,वक्त के सब पाबंद रहो,

सद प्रयत्न परिश्रम करिएवक्त क्षणिक मेहमान है। वक्त की-----।

वक्त बड़ा अनमोल हैइसका कोई मोल नहीं,

सदुपयोग वक्त का करिएबन जाएंगे काम है। वक्त की-----।

वक्त सफलता की कुंजी है,वक्त पकड़ सब काम करो,

कामयाबी मिलके रहेगीयह कहता "कुशराम" है।।

वक्त बड़ा बलवान हैयह तो बहुत महान है।

वक्त की धारा जो अपनातावही खरा इंसान है।।

रचनाकार-बी एस कुशराम बड़ी तुम्मी

जिला अनूपपुर (मध्य प्रदेश)

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मन की गोद में (कविता)

मन की गोद में 

- रजनीश हिंदी(प्रतिष्ठा)



आशाएँ टिकाए, मन गड़ाए वह बूढ़ी

  अपने चुटपुट सामानों पर

कुछ मिठाईयाँ,कुछ रसद

  कुछ पूजन सामग्रियाँ.........

एक ही बोरी में बिछी थीं

  ये मनमोहक आकृतियाँ.........

ले लो कुछ सँभाले, तरासे मीठी नाजुक

  स्वादमूल अशर्फियाँ.........

धनिकों सुनते हो ये

  सब सिसकियाँ..........

आदि प्रातः से ग्रीव व्यस्त किये

  आशाएँ टँगाए हूँ

कलयुगी मानव सुनते हो

 मूल वस्तुएँ, रंजित वस्तुएँ

  चाहो तो लेलो, ले लो।

 आधुनिक रंगों से रँगी वस्तुएँ

  नहीं बेचती हूँ

 सुन ले हृत अर्जियाँ.........

  न रसायन का लेप,

 और ना ही कच्ची सामग्रियाँ

  मैं बेचती हूँ हृत व्यंजित राशियाँ.........

सत्यता और शुद्धता की माप से

  स्वयं बुनाती हूँ, मन चलाती हूँ

बेचती हूँ मैं, मन-मोतियाँ

   हाँ-हाँ बेचती हूँ मन-मोतियाँ..........

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रक्षाबंधन (कविता)


          रक्षाबंधन

आया राखी का त्यौहार, छायी खुशियाॅं बेशुमार।
भ्राता भगिनी का त्यौहार, निभाना रिश्ता बारम्बार॥

जाति धर्म से परे ये उत्सव, रस्म रिवाज अनुकूल।
भ्रात-भगिन का प्यार उमड़ता, रहे उभय समतूल॥
बना ये रक्षा सूत्र आधार। निभाना रिश्ता बारम्बारª॥

बहना बाॅंधे प्रेम का धागा, भइया की भवि रक्षित हो।
मनोकामना उज्वलता की जीवन सदा सुरक्षित हो॥
मिले सुख चैन सदा भरमार। निभाना........

भ्राता फिर गर्वान्वित हो, बहना पर बलि बलि जाता है।
सुख-शांति सुरक्षा की खातिर, संकल्प शपथ खा जाता है।॥
इसी मतलब का है त्यौहार। निभाना.........

यह मामूली सूत्र नहीं, अटूट प्रेम का बंधन है।
अनमोल सूत्र स्नेहभरा, कहलाता रक्षाबंधन है॥
प्रगाढ़ संबंध भरा त्यौहार। निभाना..........॥

मंगल कलश सजा जब बहना, भाल पै तिलक लगाये।
रक्षा सूत्र कलाई बांधे, भ्रात का सीना फिर तन जाये॥
हो ताजा भ्रातृ-भगिन का प्यार। निभाना .....

कारागृह में बहनों को भी, मिलती ये आजादी।
सीमा रक्षक योद्धा भी, बनते इससे फौलादी॥
करे पराक्रम का ये संचार। निभाना रिश्ता बारम्बार॥

भ्रात बनाकर कर्मवती ने मुस्लिम को राखी भेजा था।
समझाा था मूल्य हुमायूॅं ने रक्षा में सेना भेजा था॥
किया मेवाड़ का बेड़ा पार। निभाना रिश्ता......

भारतीय संस्कृति की गौरवगाथा गाते उत्सव सारे।
कहैं सहोदर मिल जुल कर सब प्रकटाओ भाई चारे॥
मानवीय मूल्यों का ये आधार। निभाना रिश्ता बारम्बार॥

काव्यरचना:-

राम सहोदर पटेलशिक्षक

शासकीय हाईस्कूल नगनौड़ी 

गृह निवास- सनौसीथाना-ब्योहारी जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)


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श्रावण (कविता)

           

                श्रावण 

शस्य श्यामला श्रावण सुषमा,

        सरिता सरोवर सवारि सराबोर हैं।

पर्वों की रानी शिव को सुहानी,

        धर्म व्रत में लीन किशोरी किशोर हैं॥

प्रकृति सुषमा मनभावनि शीतल सुहावनि,

        जल से प्लावनि छाई खुशी चहुंओर है।

श्याम घटाघिरि घुमड़-घुमड़ नभ,

        गर्जे घम-घमा-घम घनघोर हैं॥

चपला चम-चमा-चम चमक,

        चिनगारी चंचल चजे चहुओर है।

सारंग पर पसारे पागल सा प्रमुदित,

        नरतन करे हो भाव विभोर है॥

आह्लादित अचला अनोखी,

        अति अनुपम छटा चितचोर है।

मण्डूक टर-टरपिउ-पिउ पपीहा,

        मनु चन्दा को पा हर्षित चकोर है॥

बीथिन-बिच कीच मची अति,

        राहगीरन पग परत कहीं और है।

हरीतिमा प्रसर गयो बनबागबाटिका,

        बगारन बहार आयो प्रति ठौर है॥

कृषक हर्षित मन लहक उठा,

        लहरात फसल देखत कर गौर है।

सावन अति पावन दीठ लगे,

        अद्भुत आनंदमयी माह सिरमौर है॥

तटिनी-तड़ाग योवन में मस्त हुए,

        गहबर गिरि कानन शोभित सब ठौर है।

सरबरसरसिज सौरभ से सुरभित,

        सरसरात शीतल समीर सब ठौर हैं॥

लावण्य रसपान करें देव-दनुज सब,

        खग-मृग मनुज मधुरस ले भौर हैं।

कहत सहोदर सावन के सुषमा में,

        प्रोन्नत हेतु पौध रोपण करें ठौर-ठौर है॥

काव्यरचना:-

राम सहोदर पटेल, शिक्षक

शासकीय हाईस्कूल नगनौड़ी 

गृह निवास- सनौसी, थाना-ब्योहारी जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)

 

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॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा होई। त...