शनिवार, जनवरी 31, 2026

प्रेम: कविता

प्रेम — राम सहोदर पटेल

प्रेम

— श्री राम सहोदर पटेल
दोहा
प्रेम बनाए काम सब, प्रेमहि सुख आधार ।
वशीकरण यह प्रेम है , प्रेम जीवनाधार ।।
चौपाई
प्रेम से प्रेम बढ़े दिन दूना। प्रेम बिना यह जीवन सूना।। प्रेम प्रसंग पवित्र पियारा। प्रेम पराग मधुप पग धारा।। प्रेम पियासे सुर नर मुनि सब। प्रेमहि बसी भये खगमृग सब।। प्रेम के बसी होहि भगवंता। प्रेम में रति का बास अनंता। प्रेम से राष्ट्र अमित अखंडा। प्रेम दिलावे नहि कछु दंडा।। दंपति प्रेम कुटुंब सुधारहि। संपत्ति प्रेम शकल निस्तारहि।। कर्तव्य से प्रेम प्रतिष्ठा देई। लोगन प्रेम सुखद फल होई।। प्रेम का भूखा हर नर नारी। प्रेम से मिले महातम भारी।।
दोहा
जे निज स्वारथ रत रहहि, करे न कछु उपकार।
ते नर पशुवत जियत हैं, पावत नहिं सत्कार ।।
चौपाई
प्रेम सकल रस की है खाना। प्रेमहि बसी होहि भगवाना। प्रेम अकर्षण और उजाला। प्रेम उमग उत्साह का प्याला। प्रेम दिलों दिल का है मेला। प्रेम स्वभाविक भावुक खेला। प्यार मोहब्बत नाम अनेका। स्नेह इश्क लव एक से एका। ढाई आखर का यह नामा। व्यापक अर्थ शकल सुख धामा जाकी होहि भावना जैसी। प्रेम प्रकट होवे तिन तैसी।। प्रेम बीज अंकुरन समाना। तरुवर होहि फूल फल नाना।। धरणी मन उपजाऊ जैसे। प्रेम फले मन तरुवर तैसे ।।
दोहा
अपनापन ही प्रेम है, प्रेम समर्पण भाव ।
प्रेम समन्वय भाव का, संकट प्रेम बचाव ।।
चौपाई
प्रेम होय दुख-सुख का साथी। प्रेम से शीतल हो द्विछाती।। परम पवित्र है प्रेम पिपाशा। अंतर्मन अभिव्यक्ति दिलासा।। प्रेम न टूटे काहू तोड़े। प्रेम बसी होवे हैं जोड़े।। प्रेम बिखरना नहीं चाहता। लेकिन निष्छल भाव चाहता।। प्रेम शक्ति है प्रेम भक्ति है। निस्वार्थ चाह की अनुरक्ति है।। मानव को मानवता देता। जीवन को अनुशासन देता ।। प्रेमहि जीवन हो आबादा। कपटी प्रेम करे बरबादा ।। निश्छल प्रेम करे जो कोई। जीवन शकल जनम फल होई।
दोहा
तन-मन-धन सब प्रेम है, प्रेम मानवी मूल्य।
प्रेम बिना सृष्टि नहीं, प्रेम प्रकृति अनुकूल ।।

प्रेम रंग व्यापक अती, प्रेम बिना सब सून।
प्रेम ही जीवन मृत्यु है जीवन प्रेम सुकून
चौपाई
वत्सल प्रेम माता उपजाये। गुरु प्रेम मारग दिखलाये।। जीवन साधे प्रेम पिता का। जग साधे ज्यों लौ सविता का।। परिजन प्रेम उठाये ऊपर। ज्यों गिरिवर चोटी ले ऊपर।। सभ्य समाज सो प्रेम बढ़ाये। सदा सुखी आनंद मनाये।। प्रेमहि प्रेम बढ़े दिन राती। प्रेम बिना नहीं ठंडक छाती।। राष्ट्र प्रेम सम नहीं कछु सेवा। यह विचार मन में धरि लेवा। प्रेम भार्या जीवन साथी। जिससे जीवन होवे हाथी ।। सुत का प्रेम बुढ़ापा साधे। सुता प्रेम रिश्ता में बांधे।।
दोहा
प्रेम सहोदर राखिए, सब सो नित प्रति जोय।
प्रेम तार टूटे नहीं, राखहु याहि संजोय ।।
[इस ब्लॉग में रचना प्रकाशन हेतु कृपया हमें 📳 akbs980@gmail.com पर email करें।]

2 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र कुमार पटेल ने कहा…

बहुत खूब।

रजनीश रैन ने कहा…

👏बड़ा ही प्रभावी शब्द-संयोजन........
महोदय आपके कला-शक्ति को सलाम है
👏👏

॥ दगाबाजों से सावधान ॥ चौपाई जब बारी ही फसल उजारे। कर दीजै तब उसे किनारे॥ विश्वासघात अंगरखा हो...