रविवार, जून 13, 2021

खड़ी फसल जानवरों से चराने की कीमत: डा ओ पी चौधरी




खड़ी फसल जानवरों से चराने की कीमत

बात सन 1975 के पहले या यों कह लें कि चकबंदी से पहले की है,जब हमारे खेत अलग - अलग हुआ करते थे।यह घटना/कहानी है ग्राम मैनुद्दीनपुर,जलालपुर,जनपद अम्बेडकरनगर की,जहां हमारा नार गड़ा है,वहीं हमारे घर के सामने और सार(पशुशाला)के ठीक पीछे हमारे काका श्री राम जतन वर्मा,जिनकी स्मृतियां ही अब शेष हैं,का खेत था, जिसमें धान और गेहूं की फसल लगाते थे।बहुत ही साफगोई और बिना लाग - लपेट के अपनी बात कहने में माहिर या हम कहें की मन की बात दिल में और दिल की बात मन में न रखने वाले बेहद खुशदिल इंसान थे।उस समय खेती बैल से होती थी। 8 –9 बैलों के साथ ही गाय और भैंस कुल मिलाकर 15 से 20 या उससे भी अधिक जानवर हमारे यहां हुआ करते थे,जो बांस के खूंटे में पगहे(सन या सुतली से बनी रस्सी)से बंधे रहते थे।उस समय लोहे वाली जंजीर अपने यहां बाजार में नहीं थी।पानी से भीगते -भीगते खूंटा और पगहा दोनो कमजोर हो जाते थे।कुछ जानवर भी हम लोगों(इंसानों)जैसे ही दुष्ट हुआ करते थे और पगहा या खूंटा जरा सा कमजोर हुआ कि, उसे तोड़कर,उखाड़कर राम जतन काका के खेत में चरने चले जाते थे। कुत्तों के भौंकने से यह अनुमान लगाया जाता था कि कोई जानवर छूटा हुआ है या कोई अजनबी आ गया है।प्रायः अच्छू बाबू(श्री अच्छेलाल राजभर),राम उजागिर यादव या कोई भी जो जग जाए वह उसे पकड़कर बांध देता था।सुबह या जब भी रामजतन काका खेतवाई करने आते थे तो चरी हुई फसल को देखकर मां, बहिन की इतनी गाली देते थे कि आज कोई सोच नहीं सकता,और आज देने पर तो लाठी चलना दूर भयंकर मारपीट हो जायेगी।जबकि जिसको गाली से नवाजते थे हम सभी उनके अपने ही थे।जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि वे मन में कुछ नहीं रखते थे।शाम को प्रायः हमारे घर आ जाते थे(सुबह गरियाते थे उसी दिन शाम को ही)और देर तक बैठते थे, चाय पानी होता था,लगता है कुछ हुआ ही नहीं है।कितनी समझदारी थी।लेकिन यदि कोई गाय, भैंस चराने सिवान में गया है और किसी गोवंश ने किसी के खेत में मुंह डाल दिया तो चरवाहे को गाली और कई बार थप्पड़ भी सहन करना पड़ता था,इसीलिए पुरनियों ने कहा था कि "खेत खाय बकरी, मार खाय जुलाहा", अब जब 70 वर्ष बाद देश में बहुत कुछ नया हो रहा है(माननीय लोगों का कहना है) और विकास के लिए जरूरी भी है,अब यह कहावत अपना अर्थ खो चुकी है,क्योंकि जानवर खुलेआम फसल चर रहे हैं जैसे किसान की छाती पर, मूंग दल रहे हों

अब परिवर्तन की लहर आ गई है,लेकिन अफसोस कि काका अब रहे नहीं,रामराज्य को देखने के लिए।जबसे प्रदेश में कल्याणकारी सरकार आई है,पशुओं के कल्याण के लिए उनके हित में बहुत बड़ा फैसला किया कि अब जानवर स्वतंत्र रूप से फसलों को चरें या रौंदे कोई कुछ नहीं बोलेगा,सरकार ने बहुत से खेत वाले,फसल लगाने वाले किसानों को प्रति परिवार रोजाना 16.50 रुपए देकर उनका मुंह बंद कर दिया है(एक किसान के परिवार में प्रायः 5 या 7 लोग होते हैं,रोज की यह सम्मान राशि काफी है,प्रति व्यक्ति रोज कितना हुआ आप स्वयं निकालिए),शेष लोग मनरेगा में काम करें,जहां पर भी लगभग मुफ्त ही मजदूरी मिलती है, कम काम,अधिक दाम,खेती करके कौन निकाले अपने प्राण।सबसे मजेदार तो यह लगता है कि पहले जो कुत्ते छूटे हुए जानवरों को देखकर भौंकते थे अब छुट्टा जानवरों को देखकर भी नहीं भौंकते,यह पता करना मुश्किल हो गया है कि कुत्ते जानवरों के साथ हो गए हैं? या सरकार के सहयोग में आ गए हैं ?किसान भी क्या करे किसे गाली दे जब लोग अकेले ही हैं,केवल झोला या अचला ही साथ है। यहीं इसका अंत नहीं होता कुछ ऐसे भी किसान हैं, जिन्हें सम्मान निधि नही मिलती,उसे लेने में उन्हें अपना सम्मान खोता हुआ दिखाई देता है या लेखपाल व सेक्रेटरी अथवा सरकारी मशीनरी के शिकार हैं,वहां मांग और आपूर्ति में अंतर होने के कारण वे वंचित रह जाते हैं,इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पाते हैं।ऐसे किसान दिन भर खेत में हाड़तोड़ मेहनत करते हैं और रात में जागकर छुट्टा जानवरों को हांककर किसी पड़ोसी खेत में करके अपनी फसल बचाने का यत्न करते हैं।

अभी तक वृद्धाश्रम व्यक्तियों के लिए बने थे,कुछ लोग परिवार द्वारा इतने उपेक्षित किए गए कि जिस परिवार को बढ़ाने में पूरी जवानी लगा दी,उसी परिवार में अब केवल मार्गदर्शक की भूमिका में हैं,जो सलाह तो दे सकते हैं,लेकिन अनुपालन की कोई गारंटी नहीं है।अब ऐसे आश्रय स्थल गोवंश के लिए या बेरोजगार सांडों के लिए भी बन गए हैं,लेकिन वहां वे सुखी कम हैं क्योंकि सरकारी नियंत्रण में हैं,व्यक्तिगत आजादी छिन गई है,ऐसा उनकी कद-काठी देखकर लगता है।हमने माता को भी अलग कर दिया,कंटीले तार या चहारदीवारी में कैद, बेटा स्वतंत्र होकर चाहे जहां मुंह मारे,’आगे नाथ न पीछे पगहा,खाय मोटाय भयेन गदहा

बहुत से ऐसे गौ रक्षक हैं,जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से जानते हैं,लेकिन जिन्होंने शायद ही कभी गोवंश का पालन-पोषण,सानी - पानी,गोमूत्र- गोबर स्वयं किया हो।वह हम किसानों की या गोपालकों की पीड़ा नहीं महसूस कर सकते हैं।खैर उससे हमारा कोई मतलब नहीं है।मूल बात यह है कि जानवरों द्वारा किसान द्वारा उगाई गई, कच्ची या तैयार हुई फसलों को चराने या रौंदवाने,बरबाद करवाने का जो चमत्कारी कार्य इस समय हो रहा है,जिससे किसान परेशान, हलकान तो है लेकिन प्रतिवर्ष 6000 की किसान सम्मान निधि पाकर चुप है या वेवश है?यह वक्त पर छोड़ते हैं।कहा भी गया है कि हर सय वक्त का गुलाम।

जोहार धरती मां,जोहार प्रकृति,जोहार किसान

डा ओ पी चौधरी

समन्वयकअवध परिषद, उत्तर प्रदेश ,सम्प्रति,एसोसिएट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी मो 9415694678 Email: opcbns@gmail.com


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मंगलवार, जून 01, 2021

हुजूर वह भी एक जमाना था;जब समाज घड़ी,रेडियो और साइकिल का दीवाना था: डॉ ओ पी चौधरी



हुजूर वह भी एक जमाना था;जब समाज घड़ी,रेडियो और साइकिल का दीवाना था।
                         जनाब क्या जमाना था उस समय जब लोग घड़ी,रेडियो और साइकिल को स्टेटस सिंबल मानते थे, बहुत चलन था,हमारी पीढ़ी जानती है।दाऊ काका(स्मृतिशेष रामदया वर्मा,हमारे ताऊ जी) उसे घड़ी,साइकिल और बच्चा कहकर अपने व्यंगात्मक शैली का इजहार करते थे।अक्सर लोग बाएँ हाथ की कलाई में घड़ी बांधते थे।कुछ लोग जो काफी शौकीन थे वे लोग दाहिने हाथ की कलाई में घड़ी का फीता बांधते थे,किसी की घड़ी में चेन लगी हो तो क्या कहना।ऐसे शौकीन लोग प्रायः टेरीलीन की पैंट - शर्ट पहनते थे।कुछ लोग सफेद धोती व कलकतिहा कमीज पहनते थे।इतना ही नहीं धोती का एक कोना या तो हाथ में लेकर चलते थे या फिर कमीज के पाकेट में डाले रहते थे।ऐसे लोग शौकीन मिजाज हुआ करते थे और अपनी जिंदादिली के लिए जाने जाते थे।जिधर से निकलते थे बरबस ही लोग एक नजर देखते थे,और इतना ही नहीं, बकायदे उन पर चर्चा भी करते थे।क्या समय था साहब,घड़ी तो कमबख्त उसवक्त काम लोगों के पास हुआ करती थी लेकिन वक्त बहुत हुआ करता था लोगों के पास।सुबह खेत में,दोपहर दालान या मड़हे में आराम,फिर काम या नतैती में जाना, नहीं तो शाम को फिर किसी के पास बैठना,खेती - बाड़ी,गाय - गोरु,बैल की चर्चा।यदि किसी के यहां कोई नातेदार आया है तो गांव में निः संकोच भ्रमण।इतना ही नहीं हमारे गांव का ही एक पुरवा है साईंपुर समसपुर वहां के बाबू सभापति सिंह के यहां गुरूदीन मामा आते थे वे हमारे यहां भी आ जाया करते थे,हम सभी मामा से गीत सुनते थे।जाने कहां गए अब वो दिन, वह स्नेह,अपनापन, मान - सम्मान।एक घटना का जिक्र और करना चाहूंगा। मुझे हाई स्कूल में अध्ययन के दौरान अपने ननिहाल करौंदी,जलालपुर में रहने का मौका मिला,पूरे गांव में ननिहाल,चाहे जिसके घर पहुंच जाया करता था,सभी जगह नाना - नानी, मामा - मामी,भैया- भाभी। हालचाल लेने में केवल माता - पिता ही धुरी में नहीं रहते थे बल्कि बैल,गाय,भैंस,फसलें भी हुआ करती थीं।बहुत विस्तृत दायरा होता था।शाम को लगभग सभी किशोर व युवक एकत्र होते थे,व्यायाम किया करते थे, गजयी मामा की देख रेख में,उनकी अनुपस्थिति में अच्छेलाल भैया यह जिम्मेदार संभालते थे।अब वह सामाजिक ताना- बाना बिखरता जा रहा है।मैं फिर अपने मूल बात घड़ी पर आता हूं।उस समय एक टेबल वॉच होती थी जिसमे सुबह 4 बजे का अलार्म लगाकर सोते थे,बजते ही उठना होता था, पढ़ने का समय हो जाया करता था।विद्यालय में,सरकारी कार्यालयों में दीवाल घड़ी, दीवार पर टँगी रहती थी।समय के अनुरूप वह उतनी बार टन- टन की आवाज करती थी।बहुत से लोग घरों की बैठक में भी  लगाए रहते थे।गांधी जी एक गोल घड़ी रखते थे।जिसे वे अपने कमर से नीचे धोती में ही लटकाये रहते थे ।उन दिनों बहुत से लोग कलाई घड़ी या गोल घड़ी समय देखने के लिए अपने पास रखते थे।उन दिनों समाचार, गाने, नाटक आदि सुनने के लिए लोग रेडियो रखते थे, इसमें कई- कई बैण्ड के रेडियो हुआ करते थे।लोग सिलोन,विविध भारती,बीबीसी लंदन बड़े शौक से सुनते थे।जब एशियाड का आयोजन दिल्ली में 1982 में हुआ तो लोग दिल्ली मॉडल पॉकेट रेडियो का उपयोग ज्यादा करने लगे क्योंकि वह आसानी से कहीं ले जाया जा सकता था।उन दिनों साइकिल कही आने जाने के लिए मुख्य साधन थी।लोग 40 से 50 किमी की दूरी आसानी से तय कर लेते थे।मैं स्वयं अकबरपुर(हमारे गांव से लगभग 25 किमी की दूरी है)अनेक बार डीजल लेने या अन्य किसी कार्य से गया और आया हूं। एक बार तो पैदल ही लाले बाबा(स्मृतिशेष लालता प्रसाद सिंह) के साथ अकबरपुर से घर आया हूं।अब समय के बदलाव के साथ घड़ी, रेडियो और साइकिल सभी में बदलाव आ गया है।अब फटफटिया का जमाना है।मोबाइल में घड़ी, रेडियो,वीडियो सभी कुछ है,और सभी के हाथ में है। उन दिनों सायकिल का भी बड़ा क्रेज था। गांवों में शादी में साइकिल,घड़ी, रेडियो तीनों जरूर मिलते थे, फाउंटेनपेन भी, कभी कभी साथ में अंगूठी/चेन भी।सायकिल में  हरकुलिश,बीएसए,एटलस बाद में हीरो पहली पसंद हुआ करती थी।रेडियो में फिलिप्स, मर्फी,बुश  और घड़ी में एचएमटी और एचएमटी- तारीख हो तो क्या कहना,फाउंटेनपेन -  कैमलिन का कोई जवाब नहीं था। ।इसके बाद   एटलस,हीरो,बी एस ए,एशिया सायकिल थी। पेन वह भी बढिया वाली फाउन्टेन पेन का चलन।जिस शादी में ये चीजें मिल जाती थी तो वह बढ़िया(दान- दहेज की दृष्टि से)शादी मानी जाती थी। अंगूठी भी पहनने का खूब चलन था। लोग अक्सर सामने वाले पाकेट में पेन लगाकर चलते थे ।जो लोग जरा शौकीन थे वे लोग हरकुलिश सायकिल,हाथ में घड़ी,अंगुली में अंगूठी और पाकेट में कलम और कुछ लोग तो बगल में कांधे में रेडियो भी टांगे रहते थे।उस समय शादी में  खिचड़ी खवाई पर यह पांच चीजें मिल जाती थी तो वह चर्चा का विषय हुआ करती थी गांव - जवार में।तब दूल्हा जोड़ी - जामा या पैन्ट - शर्ट,तौलिया जरूर कंधे पर रखता था।कुछ लोग बाद में खिचड़ी खाते समय सफारी भी पहनते थे।लड़की का पिता प्रायः नई बनियान और धोती (एक कोने में हल्दी लगी रहती थी)में दूर से ही पहचान में आ जाता था।खैर छोड़िए जनाब इन बातों को जब समय बदला तो टेलीविजन, मोटरसाइकिल,फ्रीज,कूलर आदि गैस का सिलेंडर और चूल्हा भी कभी - कभी हुआ करता था; ने  साइकिल,घड़ी,रेडियो को विदा कर अपनी जगह बना लिया।अब तो कल्पनातीत बड़ी-बड़ी कार,फ्लैट,जमीन आदि - आदि और क्या- क्या कह नहीं सकते ,क्योंकि हमारे परिवार ने 10 बेटियां ब्याही, ऐसा कुछ अनुभव हम लोगों का नहीं रहा।यह भी सुना है की कुछ लड़के वाले तो पूरी सामान की सूची ब्रांडेड  कंपनी  का उल्लेख करते हुए लड़की वाले को बिना किसी संकोच के पकड़ा देते हैं।समय के साथ समाज में परिवर्तन आया और हमारी जरूरतें भी परिवर्तित हुई लेकिन बस बदलाव जो नहीं हुआ है वह लोगों के लेन- देन के व्यवहार में,वह बढ़ता ही जा रहा है।दिखावा,बनावटी व्यवहार, आत्मकेंद्रीयता,
 स्वार्थपरता,बढती जा रही है;सामाजिक ताना - बाना छिन्न - भिन्न होता जा रहा है,रिश्ते सिमटते जा रहे हैं,तुरपन की सख्त जरूरत है। कोविड ने एक महामारी के रूप में अपनी भयावहता से हमें आतंकित कर दिया है,लेकिन कुछ हद तक प्रकृति की सीमा का अतिक्रमण करने का एहसास भी मानव को दिलाया है। कोरोना काल में कुछ सकारात्मक परिवर्तन की आस में हमें  आत्म अवलोकन और अपनी प्राथमिकताओं को पुनः परिभाषित करने की जरूरत है।
     
     डा ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी
मो:9415694678
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शुक्रवार, मई 28, 2021

प्रकृति (कविता) : शोभा तिवारी 'समीक्षा'


  
शीर्षक  -  प्रकृति (कविता)
प्रकृति के ये नजारे 
            कितने सुंदर कितने प्यारे ,
नौका मे  करूँ विहार 
          कभी इस आर कभी उस पार,
नीले  गगन तले 
                    चले  ठंडी -ठंडी पवन,
देख कर दृश्य यह
              भाव विभोर हो रहा मन  ।
नदियॉ रहती अपनी धुन में 
              आसमान नीला - नीला 
खुबसूरत इन वादियों में 
                पक्षी उड़ते मस्तमौला
मन करता  हैं मै भी 
                  पक्षी  बन उड़ जाऊँ 
छू   लूँ  जाके गगन 
            हवा के साथ लहराऊँ ।
सुबह का सूरज उगता जैसे 
               नयी प्रेरणा  लाये 
उठो , जागो ,काम करो
            आलस त्यागो यही  सिखायें 
  इन बहारों  को देख 
                 खुशी मिल गयीं 
लगता  है जैसे 
           दिल की कली खिल गयी 
 कितनी सुंदर , कितनी प्यारी 
              लगती  हैं धरती  हमारी ,
 प्रकृति का श्रृंगार कर  सुन्दरता 
              हो जाती और भी  न्यारी।
इसी प्रकृति  के प्रेम मे
             आओ कही खो जाएँ ,
करते  रहे  प्रयत्न  हम अपनी 
         प्रकृति  को खुशहाल  बनाये ।
रचना:-
शोभा तिवारी "समीक्षा "  
          कोटाबाग , 
   नैनीताल , उत्तराखंड
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कोविड-19:बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान


कोविड-19:बेपटरी अर्थव्यस्था को सुदृढ़ करने में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान


       
           कोविड-19,वर्ष 2020 की एक अत्यंत भयंकर महामारी व त्रासदी है,जिसके कारण 24 मार्च, 2020 से लगातार 68 दिनों के लॉक डाउन,उसके बाद अनलॉक डाउन की लंबी श्रृंखलाओं ने हमारे जन- जीवन के साथ ही हमारी अर्थ व्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है।हमारी पूरी अर्थ व्यवस्था बेपटरी हो गई है।बहुत बड़ी संख्या में कामगारों का पलायन शहरों से गांवो की ओर हुआ।उद्योग धंधे,कल - कारखाने,निर्माण कार्य सभी ठप हो गए।सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार पिछले साल भर में 98 लाख लोगों की नौकरी गई है। कोरोना की दूसरी लहर ने दोबारा नया संकट पैदा कर दिया है।पहली लहर के बाद भारतीय अर्थ व्यवस्था तेजी से सामान्य होने की ओर बढ़ रही थी और इसमें ग्रामीण क्षेत्र बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी)में कृषि क्षेत्र की भागीदारी 13 फीसदी है,जो तीसरे नंबर पर आती है। कोरोना काल में भी रबी की फसल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था।कटाई व मड़ाई के समय थोड़ी राहत से निर्बाध रूप से यह कार्य संपन्न हुआ।लेकिन दूसरी वेब में फिर से बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली,मुंबई,पंजाब,
गुजरात से लोग उत्तर प्रदेश और बिहार आए। चूंकि उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनाव चल रहे थे,इसलिए बाहर से आने वाले लोग बिना पृथकवास और संगरोध के सीधे अपने घरों को पहुंच गए।चुनाव के साथ ही सहालग और धार्मिक आयोजनों के फेर में गांवों तक कोरोना ने दस्तक दे दिया है,जहां जांच और इलाज दोनों के साधन कम हैं।
           यह बात और गंभीर हो जाती है कि हमारी अर्थव्यवस्था पिछले वर्ष के लॉक डाउन के कारण पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ सकी थी।अब पुनः उससे भी बुरी तरह से महामारी ने हमारे देश को प्रभावित किया है,और अबकी बार गांवों में भी संक्रमण बढ़ा हुआ है।प्रतिदिन पूरे देश में चार लाख से भी अधिक लोगों का संक्रमित होना बहुत बड़े खतरे की निशानी है।फिर भी सुखद संयोग है कि अब जब खरीफ की फसल बोई जा रही है, तैयारी चल रही है,तेजी से स्थिति सामान्य हो रही है।स्वास्थ्य सेवाओं में भी इजाफा हुआ है, सरकार भी चुनाव की व्यस्तता के बाद पूरी मुस्तैदी से महामारी के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी सारी मशीनरी झोंक दी है।इस दौरान भी जब हर सेक्टर में नकारात्मक ग्रोथ थी,अकेले कृषि क्षेत्र ऐसा रहा,जिसमें सकारात्मक विकास दर रही है,अर्थात  भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद कृषि सेक्टर पर ही आश्रित रही। एच डी एफ सी बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री अभीक बरुआ बताते हैं कि कोरोना महामारी के समय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत समझ में आई।
          ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और सुदृढ़ करने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में व्यापक बदलाव व सुधार की जरूरत है:
1.मनरेगा के अन्तर्गत खेती के कार्यों को भी सम्मिलित किया जाए,जिसमें कार्य करने वाले को आधी मजदूरी संबंधित किसान ग्राम प्रधान के माध्यम से भुगतान करे और आधी सरकार वहन करे।राजकोष की बचत होगी साथ ही समय से खेती का कार्य भी सुगमता पूर्वक हो जायेगा, लागत भी कम आयेगी।सरकार की मंशा के अनुरूप किसानों की आय भी बढ़ेगी।
2.सभी फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया जाय और किसानों से उसकी सीधे खरीद की जाय। बिचौलियों को सस्ते दामों पर अनाज के खरीद से रोका जाय।किसान सरकारी खरीद केंद्रों की मनमानी की वजह से सस्ते दामों पर इन बिचौलियों को आधार कार्ड, बैंक पासबुक व खतौनी की प्रति देकर बेचने को मजबूर है।
3.बुवाई से पूर्व ही किसानों को उत्तम बीज की व्यवस्था सहकारी समितियों/ग्राम पंचायतों के माध्यम से किया जाय।ब्लॉक स्तर से इसे ग्राम पंचायत स्तर पर लाया जाए।ताकि सभी को उनकी जरूरत के अनुसार मिल सके।
4.किसानों को प्रर्याप्त मात्रा में उर्वरक मुहैया कराया जाय,हरी खाद,कंपोस्ट खाद और जैविक खाद के प्रयोग हेतु विशेष योजना बनाकर उन्हें प्रेरित किया जाय और प्रशिक्षित किया जाय।
5.गन्ना, आलू,दलहन,तिलहन जैसी नगदी फसलों को बढ़ावा दिया जाय।इनके भी एम एस पी पर बिक्री का प्रबंध किया जाय।
6. घड़रोज और छुट्टा जानवर किसानों की फसल ही नहीं बरबाद कर रहे हैं, और उनको आर्थिक क्षति ही पहुंचा रहे हैं, बल्कि उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर कर रहे हैं।जब दिन की कड़ी मेहनत के बाद रात को भी जागकर इन जानवरों से अपनी फसल की रक्षा करता है तो नींद न पूरी होने से अनेक बीमारियां उसे जकड़ लेती हैं।ऊपर से जो घर में जमा पूंजी थी उसे खेत में लगा दिया और छुट्टा जानवर उसे सफाचट कर गए तो "घर की मसुरी भी बयाना" वाली कहावत चरितार्थ हो गई।इसलिए सरकार के स्तर पर इन जानवरों का मुक्कमल प्रबंध किया जाय ताकि फसल बची रहे,किसान की आय बढ़े साथ ही देश की जी डी पी में भी वृद्धि हो सके।किसानों को प्रतिवर्ष मुफ्त (सम्मान निधि)में करोड़ों रुपए की इमदाद से भी राजकोष का बोझ कम हो जायेगा।मछली देने से अच्छा है उन्हें मछली पकड़ना सिखायें।
7.कृषि आधारित कुटीर उद्योग स्थापित किए जाने हेतु प्रोत्साहित किया जाय और उनके उत्पादित माल की बिक्री का पूरा प्रबंध किया जाय ताकि उन्हें वाजिब दाम मिल सके।
8.ग्रामीण क्षेत्र में  बिजली,पानी,सड़क,स्वास्थ्य,
और शिक्षा का पूरा प्रबंध किया जाय,ताकि पलायन को रोका जा सके।लोग गांवों में रहकर कृषि कार्य व उससे आधारित कुटीर उद्योग को अपना सकें।
9.पधुधन और कृषि आधारित खाद्य प्रसंस्करण,उनके रख रखाव के पूरे प्रबंध किए जाय।यह कार्य सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देकर किया जा सकता है।
10.किसानों को जो नगद धनराशि देकर सम्मान निधि बताया जा रहा है,उसके स्थान पर उन्हें सम्मान जनक और स्वाभिमानी जीवन जीने हेतु, श्रम करके अपना भोजन व अन्य जरूरी सामान जुटाने के लिए कृषि बीज, जुताई,उर्वरक,सिंचाई की सुविधा मुफ्त में उपलब्ध कराई जाए।ताकि वे श्रम करके अपनी रोजी और रोटी का प्रबंध करें।गांधीजी का भी मानना था कि जो बिना श्रम किए रोटी खाता है,वह अपराधी से कम नहीं है।
               निश्चित रूप से आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण में ग्रामीण क्षेत्रों का बहुत महत्त्व है।अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और जी डी पी को बढ़ाने में ग्रामीण इलाकों की भूमिका को और सार्थक बनाया जा सकता है।वरिष्ठ अर्थशास्त्री श्री अरुण कुमार जी का कहना है कि अबकी बार ग्रामीण इलाकों में भी वायरस का प्रसार हो गया है,इसलिए वहां भी उत्पादकता प्रभावित होगी।इसे ध्यान में रखकर हमें लघु एवम् कुटीर उद्योगों को प्रर्याप्त समर्थन देना होगा।,,,,नई लहर से निपटने के लिए भी हम तैयार रह सकेंगे।जान बचाने के साथ ही साथ भविष्य बचाने पर भी काम होना चाहिए।
डॉ ओ पी चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज, वाराणसी।
मो:9415694678
Email: opcbns@gmail.com
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं। ब्लॉगर टीम का सहमत होना आवश्यक नहीं।)
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बुधवार, मई 19, 2021

बचपन के वो दिन,गांव की मस्ती बनाम विकास: डॉ. ओ.पी. चौधरी

बचपन के वो दिन,गांव की मस्ती बनाम विकास
             पनघट, पगडंडी,पैड़ा,डगर, खोर, डहर, मेड़ –डांड, हल –जुवाठ, सैल,पैना,हेंगा,नाधा, हरजोत्ता, हर्ष,फार,खोंपी,पचवासी,बरारी,रसरी, नाथी, –पगहा,गेराव,मोहड़ी,सिंघौटी,खूंटा, मुद्धी, खुंटा, सकरमुद्धी, बैठनी,कूंड–बरहा,
चरखी,हौदा, धन्न, उबहन,जगत, घिर्री,गगरा,गुलौर,कईन, झुकवा, हंकवा, पकवा,बोझवा,सईका, सईकी,हौदी, गगरी, परयी,पुछिया,कड़ाह–कड़ाही,कोल्हू, कातर,तौला,कूड़ा,कमोरी, रहट, पुरवट, बेड़ी,सैर,घोल,ताल,पोखरा,गड़ही, छान –छप्पर,छनौती, बाती, बन्हन, पाती, सरपत,बेड़ा,कोरो, बड़ेर,खपड़ा,नारियां,करी, अनगब,मोखब,कोसा, कोहा,दवरी, गांज,पैर,खलिहान, अखनी, पांचा, टेडूवा, गोबरहा, लेहना,बोझ,बिसरवार, हलवाह, उपरी –चिपरी, गोइंठी, गोइंठा,मौनी, मौना, दौरी,दौरा, 
सिकहुला, डेहरी,जबरा, चूल्ह,चूल्हा, लगौना, थवना,बोरसी, पोतनहर, भितरही,मझेरिया, लीपना,पोतना,अहरा, जांता, चाकी, कांडी,सूप, चलनी,अंगिया, झन्ना, अरगनी,सिल –बट्टा, पहरुवा, पीढ़ा, पिरहई,भदेली, भदेला, पतेली,बटुली, हंडा –लोटा,भुजिया, बहुरी,गोजई, जौ–मटरा, सतुआ,पंजीरी आदि अनेक शब्द जो मुझे याद नहीं लेकिन बचपन में गांवों में लोग प्रयोग में लाते थे,सभी का प्रयोग होता था।जैसे जैसे हम भौतिक सुख प्राप्त करने में लीन होते गए हमने अपनी गंवई,देशी और विशुद्ध भारतीय  संस्कृति,अल्हड़पन,बेपरवाही सभी विसारते गए और धन तो अर्जित कर लिए लेकिन कहीं न कहीं अपने मूल्य, विश्वास,नैतिकता,अपनत्व,सामूहिक सहयोग,सामाजिक समरसता, सदभावना खोते गए या उनमें क्षरण होता गया।वैभव में सुख और आनंद तलाश करने लगे लेकिन वास्तव में इन सबसे कोसों दूर होते गए।अब गांवों में भी चिंता, अवसाद,नैराश्य,कुंठा,तनाव जैसी मानसिक बीमारियां अपना पांव पसार चुकी हैं। बीपी, सुगर सभी अब आम बात हो गई है।ऐसा क्यों हुआ यह विचारणीय है।हम भौतिकता के साधन जुटाने में अपनी सबसे बड़ी धरोहर परिवार और समाज को उपेक्षित करते गए।
            यह पढ़ते समय आपको लग रहा होगा की मैं विकास विरोधी हूं, ऐसा कदापि नहीं है, किंतु अपने स्वास्थ्य से, परिवार से समझौता कर विकास हासिल कर भौतिक सुख तलाशना कहां तक की होशियारी है। हमें यथार्थ में धरातल पर पैर जमीन पर टिका कर रहना होगा।नीचे जमीन से पांव उतना ही ऊपर ले जाए जिससे आसानी से नीचे आ सकें,आकाश की ओर बढ़ें लेकिन उतना ही कि नीचे धड़ाम से धरती पर न आना पड़े।वास्तव में हम सुख और आनंद की तलाश में रहते हैं और इस भ्रम में कि धन आयेगा तो यह चीजें अपने आप आ जायेगी,इसी मुगालते में अंधी दौड़ में भागते हैं, घर, परिवार,नाते – रिश्ते, यार –दोस्त, गांव –ज़वार सभी पीछे छूट जाते हैं और जब हम वापसी का सोचते हैं तो देर हो चुकी होती है फिर क्या न माया मिली न राम,अब क्या होगा जब चिड़िया चुग गई खेत?
           इस समय महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है।वर्तमान में अपने देश की स्थिति ज्यादा खराब है।पहली बार ऐसा हुआ कि गांव से शहर की ओर के बजाय शहर से गांव की ओर पलायन हुआ।महामारी,लॉक डाउन, पृथकवास,संगरोध,दूरियां,अपनों को खो देने का डर और दर्द,हमें अंदर से झकझोर दिया है,हम विचलित से हो गए हैं।किंतु इस विषम परिस्थिति में यदि किसी ने हमें सहारा दिया है तो वह है हमारा संपर्क, लगातार अपने मित्रों, रिश्तेदारों से जुड़े रहना, बातचीत करते रहना।उस गांव की ओर, गली, मुहल्ले की ओर रुख करना जहां हमने अपने जीवन की शुरुआत की थी, जहां की धूल भरी, मिट्टी से सनी धरती मां में पल कर बड़े हुए थे।इसी कारण बहुत से लोग अपनी रोजी,व्यवसाय आदि को ताख पर रखकर गांवो में आ गए,अपने मुहल्लों में आ गए।मेरे बचपन के मित्र हैं हाजी अब्दुल समद,कटघर मूसा,जलालपुर, अम्बेडकरनगर कहते रहते हैं कि मिलते –जुलते रहिए पता नही कब रूखसती का पैगाम आ जाय,इस कोविड काल में यह और ज्यादा समीचीन लग रहा है,लेकिन इतनी निराशा भी नहीं है।बस हमें हिम्मत और धैर्य के साथ चलते जाना है।लगातार अपनों से संपर्क में बने रहना है।सच मानिए कि इस महामारी का सामना करने के लिए सावधानी, दवाई के साथ साथ हौसला भी टूटने नहीं देना है।मानसिक तनाव ने बहुत से लोगों के हौसले को मानों चुनौती दे डाली है।अनेक मामलों में तनाव इस महामारी की गंभीरता को बढ़ा रहा है।यह भी देखने को मिल रहा है की बिना संक्रमण के भी बहुत से लोगों में यह तनाव शारीरिक कष्ट में तब्दील हो रहा है।मरीज हो या सामान्य आदमी,तनाव सभी के ऑक्सीजन के स्तर को घटा रहा है।ऐसे में हमें अपनों से जुड़े रहना है, बातचीत करते रहना है।सामाजिक दूरी नहीं अपितु भौतिक दूरी को बनाए  रखते हुए हाले दिल बयां करते रहना है।इस दौर में हाले दिल बयां करते रहना और सुनते रहना हमारी मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है।हमें यह समझना है कि किसी से अपने दिल का हल कहने का उद्देश्य हमेशा समस्या का समाधान खोजना ही नही होता है,बल्कि अपने मन में चल रहे विचारों के तूफान को शांत करना है,जिससे आप बेहतर मानसिक स्थिति में आएं और हल्का महसूस कर सकें।प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने इसे कैथार्सिस कहा है,मतलब अपनी बात कह देने से मन का बोझ उतर जाता है और व्यक्ति हल्का महसूस करने लगता है।हमें मन की बातों को अपनों से साझा करना चाहिए ताकि हमारा तनाव कम हो सके।जरूरी नहीं कि वे आपके परिवार के सदस्य हों,ये आपके मित्र ,शुभचिंतक हो सकते हैं,जिनसे आप खुलकर बिना झिझक के अपने मन की बात कह सकते हैं।अपनी बीती यहां बताना समीचीन समझ रहा हूं।बात 1998 की है,मुझे लूज मोशन के साथ बुखार आ गया, मेरा भतीजा दीप नारायण मेरे साथ रहकर लॉ कर रहा था, मेरी धर्मपत्नी ने उससे मेरे लिए दवा मंगवाई, मैने खा भी लिया अपेक्षित परिणाम नहीं मिला,फिर क्या दीप नारायण ने कहा की अनिल चाचा(डॉ अनिल श्रीवास्तव,अपर शोध अधिकारी,संभागीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण प्रशिक्षण केंद्र, वाराणसी)से बात कर लीजिए अभी तुरंत ठीक हो जाएंगे।वह जानता था की मेरी उनसे प्रायः बातचीत होती रहती है, फिर मैने बात किया भी।यह है बातचीत की शक्ति और विश्वास। महामारी के इस दौर में या कोई अन्य तनाव या बात जो मुझे  परेशान करती हो तो सबसे पहला फोन अनिल सर को करता हूं,फिर" सहयोगी – सुख-दुःख के साथी" को,अब तो रोज बात करने का क्रम बन गया है।ठीक ऐसे ही जब यहां काम से थक या ऊब जाता हूं तो घर(गांव)चल देता हूं।वहां एक रात बिताकर भी तरोताजा हो जाता हूं।कभी कभी संगम तीरे दिनेश बाबू(डा दिनेश सिंह, उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी, मेरे दामाद)चला जाता हूं।यह शक्ति है बातचीत की अपनों से मिलने की,हाले दिल बयां करते रहने से।किसी से बात करने में आपको एक अंतर्दृष्टि मिलती है,जिससे यह भी समझ में आ जाता है कि सही नजरिया क्या है।बात लंबी हो रही है समाप्ति इस निवेदन के साथ कि दुनिया भर से आ रही डरावनी खबरों पर हर वक्त विवेचना करना,बातें करना नहीं कहलाएगा,अपितु ये आपकी मानसिक सेहत को और खराब करेगा।इसे एक वस्तुस्थिति की तरह लें और अपनों से बातचीत करते रहें, हालचाल लेते –देते रहें,संपर्क बनाए रहें।अपने दिल की कहते रहें।वृक्ष कितना भी विशाल क्यों न हो तभी तक हरा –भरा रह सकता है,जब तक जड़ें मजबूत रहेंगी, जड़ों से जुड़ा रहेगा।हम भी चाहे जहां हो लेकिन जड़ों से अर्थात अपने गांवों से मोहल्लों से गलियों से जुड़े रहें।
     जोहार प्रकृति! जोहार धरती मां!
         डॉ. ओ. पी. चौधरी
एसोसिएट प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी
मो: 9415694678
ईमेल: opcbns@gmail.com
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