रविवार, अगस्त 25, 2019

शिक्षा के साथ ये क्या हो गया

आप यह लेख पढ़ रहे हैं। इसके लिए आप अपने उस पिता का शुक्रिया अदा कीजिए, जिसने आपको तीसरी आंख दी। हो सकता है, वह आपकी माँ रही हो, या आपका बड़ा भाई या आपकी बड़ी बहन जिसने आपके हाथ में पहली बार कलम रखा फिर आपकी मुट्ठी पर अपने हाथ की पकड़ रखते हुए बेतुका-सा कोई आकर बनवाया। निश्चित तौर पर कह सकता हूँ यह काम आपके किसी सगे-संबंधी ने कराया होगा। कितना अच्छा होता न! यदि वह पल किसी फोटोग्राफ्स के रूप में सुरक्षित होता, जब पहली बार आपने कुछ बेतुका सा आकार बनाया था। यदि आपने यह अपने स्कूल शिक्षक से सीखा हो तो आप उस शिक्षक को ढूंढ़े, और यदि वह इस दुनिया में हों तो जाकर उन्हें शुक्रिया कहिए। उनसे कहिए कि आप ही वह हैं जिसने मुझे संसार के भूत, भविष्य और वर्तमान को देखने में सक्षम नेत्र दिए। 

एक संस्कृति-सी थी कि जब पिता खेत से थका हारा लौटकर शाम को घर आता तो वह अपने बेटों के पास बैठता। उनको वर्णमाला के अक्षर सिखाता। उनसे वर्णमाला के अक्षरों की पहचान कराता। वह सीधी गिनती पूछता तो उल्टी गिनती भी सिखाता। पहाड़े सीधे-सीधे रटवाता तो पौना और अढ़ैया के पहाड़े भी रटवाता। पिता भोर में अपने निजी कामकाज के लिए जागता तो अपने बेटों को भी पढ़ने के लिए जगा देता। आप कह सकते हैं कि यदि इतना सब कुछ था तो फिर पहले साक्षरता दर इतनी कम क्यों थी? उसके कारण अन्य हैं। बेटियों को पढ़ाया नहीं जाता था। स्कूल इतने निकट नहीं होते थे। सड़कों की हालत खराब हुआ करती थी। उच्च शिक्षा इतनी आम नहीं थी। और जिस संस्कृति की बात हो रही है सब उसके अंग नहीं थे। परंतु जिसने उस संस्कृति का निर्वाह किया, उनका परिवार आज शिक्षा के ही माध्यम से अच्छे पायदान पर है।

शिक्षा के महत्व को लोगों ने नकारा नहीं है। इसे स्वीकार किया है। शिक्षा तक उनके बच्चों की पहुँच बन सके, इसके लिए लोग अपनी आय का अधिकांश हिस्सा खर्च भी कर रहे हैं। परंतु ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। और ऐसे लोग भी शिक्षा को खरीदना चाहते हैं, बच्चों को सिखाने में दिलचस्पी कम ही है। बच्चा आवश्यकता से अधिक तनाव और दबाव में है और पिता इतने से इतिश्री मान लेता है कि उसने अपने मेहनत से कमाए हुए पैसों से बच्चों के लिए ट्यूशन किया है, अच्छे स्कूल की व्यवस्था की है। ...खुद से बच्चों को देखने की फुर्सत नहीं है। तर्क यह कि यदि वह यही करने लगे तो फिर कमाए कौन? यह भी कि  जिन स्कूलों में दाखिला दिलाया गया है उनके पाठ्यक्रम का सिखाना उनके बस का नहीं है।  खैर...
वे लोग जो निजी स्कूल की अनुपलब्धता या अन्य कारणों से अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं (हालात यही हैं कि लोग मजबूरी में ही सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, क्यों? सोचिए।) वे भी अपने बच्चों को बहुत अच्छा बना सकते हैं। प्राथमिक शिक्षा देने में आय आड़े नहीं है, यदि कोई चीज आड़े आती है तो वह है समय प्रबन्धन। यह माना जाना चाहिए कि आज जिनके बच्चे प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने योग्य हैं उनकी इतनी शिक्षा तो हुई है कि वह वर्णमाला के अक्षर पहचान सकते हैं। वे, सुबह-शाम अपने बच्चों के पास स्वयं बैठना पसंद नहीं करते। यह नहीं कि खेत-खलिहान या बिज़नेस व्यापार के कारण समय नहीं है बल्कि वह अपने समय को फिक्स करके रखना नहीं चाहते। उन्हें आजादी पसंद है। वह एक निश्चित समय पर अपने बच्चों के साथ बैठने में गुलामी महसूस करते हैं। उनका गाँव के यार-मित्रों के साथ, या शहर में गुमटियों के संगी-साथियों के साथ बात-व्यवहार छूट जाता है। वह बच्चों को पढ़ाने के लिए भी वैसा ही एक मजदूर ढूंढना पसन्द करते हैं, जैसा कि वह अन्य कार्यों के लिए मजदूर लगा लेते हैं। या फिर वे स्कूल शिक्षक से अपेक्षा करते हैं कि यह सब उनका स्कूल शिक्षक सिखाएगा। इस बात को सोचने में कोई गलती नहीं कि यह सब स्कूल शिक्षक को सिखाया जाना चाहिए किन्तु क्या आप ऐसी आदर्श स्थिति की कल्पना हर जगह करते हैं? और क्या सच में ऐसा होता है? आप खुद के बारे में सोचिए। आपने कैसे पढ़ना सीखा था? तंत्र का विस्तार हुआ है, बदलाव नहीं। सच को स्वीकार कीजिए। 
प्रारंभ की कक्षाओं का महत्व जीवन की शेष किसी भी कक्षा से अतुलनीय रूप से अधिक है। प्रारंभ की कक्षाओं में विद्यार्थी वर्णमाला का ज्ञान सीखते हुए वह भाषायी क्षमता प्राप्त करता है जिससे वह जीवन का शेष ज्ञान पुस्तक पढ़कर सीख सकता है। हास्यास्पद है कि हम जिन विद्यालयों को आदर्श मानकर अपने बच्चों को प्रवेश दिलाते हैं उन विद्यालयों में भी चौथी और पांचवीं पढ़ने वाले दर्जनों विद्यार्थी ऐसे मिल जाएंगे जो ठीक तरह उनकी कक्षा की पुस्तक का धारा प्रवाह वाचन नहीं कर पाते। इसके पीछे दोष किसका है, इसे आप ढूंढते रहिए, किन्तु जरा सोचिए ऐसे बच्चों को क्या केवल शिक्षकों के भरोसे छोड़ा जाना चाहिए? इस बात की सच्चाई को स्वीकार कीजिए कि पढ़ाई में पीछे रहने वाले और बीच में पढ़ाई छोड़ देने के पीछे की असली वजह यही है। सीधा सा तात्पर्य है कि प्रारंभिक कक्षाओं में जब आपका बच्चा होता है तब आपके जीवन की सबसे कठिन चुनौती है। वे साल आपके जीवन की तपस्या के साल हैं, जब आपका बच्चा स्कूल में प्रवेश लेता है। यह नहीं है कि बाद के वर्षों में आपको इस तपस्या से मुक्ति मिल जाएगी। परन्तु बाद के वर्षों में आपकी इस तपस्या में और सहयोगी मिल जाएंगे। यदि आपके बच्चे की प्राथमिक शिक्षा बेहतर है तो कोई संदेह नहीं कि वह बच्चा शिक्षक को प्रिय हो जाएगा। जिसका लाभ शिक्षक के सान्निध्य के रूप में उसे प्राप्त होगा। प्राथमिक शिक्षा के लिए बहुत प्रेम, लगन और धैर्य की आवश्यकता होती है। कागज के  चन्द टुकड़ों की खातिर किसी शिक्षक में ऐसे गुण पैदा नहीं होते। ऐसे शिक्षक भी हैं; परंतु बहुत विरले। शुरुआती दिनों में बच्चों  को बैठाना, बातों-बात में उसे कुछ सिखा देना, गलतियों की अनुमति देना, बच्चों की गलतियों पर मुस्कुरा देना और  बच्चों को बिना डांटे-डपटे उसे सिखाते रहना यह किसी पिता या पिता सा भाव लिए शिक्षक में ही संभव है। 

यह घाव बहुत गहरा है कि छठवीं कक्षा में पढने वाला विद्यार्थी पुस्तक वाचन नहीं कर पाता। साधारण शब्दों को लिख नहीं पाता। हम चाहे किसी शताब्दी में जीने का दम्भ भरते रहें, परंतु समाज में ऐसे बच्चों की स्थिति हमारा मुंह चिढ़ाती रहेगी। यदि आप जागरूक होते, आपके आसपास स्थित किसी विद्यालय में जाते। वहाँ पढ़ रहे बच्चों की इस भाषायी क्षमता का आकलन करते। आप शिक्षकों से इस बात के लिए जिद करते और कहते कि बच्चों की इस कमजोर स्थिति के लिए आप ही नहीं वरन हमारा समाज भी जिम्मेदार है। हमें बताइए हम आपकी मदद कैसे कर सकते हैं। शिक्षा सामुदायिक हो गयी। शिक्षा का लोकव्यापीकरण हो गया। वह सिर्फ इस मायने में कि आपके घर के निकट विद्यालय भवन खड़ा कर दिया गया। यह बात ही मस्तिष्क को आघात पहुंचाने के लिए काफी है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी विद्यालय खोलने की ही जद्दोजहद है। उसके भीतर क्या होना चाहिए, इसकी चिंता करने वाला समाज अभी भारत में नहीं है। ऊपर से बच्चों के नींव को भरने की जिम्मेदारी हम उस शिक्षक पर छोड़ रहे हैं जिसको मध्यान्ह भोजन से लेकर चुनाव कराने तक सारी जिम्मेदारी सरकार ने भी दे रखी है। माना कि आपका बच्चा निजी विद्यालय में अध्ययन कर रहा है, फिर भी शिक्षा सिर्फ शिक्षक के बूते की बात नहीं है। शिक्षक, अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। परंतु क्या आपको शिक्षक के साथ यह संवाद करने की फुर्सत है कि आपके बच्चे को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? क्या आप शिक्षक से पूछते हैं कि वह कठिनाई कैसे दूर हो। शिक्षकों ने जो कमी की है, उसकी सजा वह पा रहे हैं। आगे बहुत सख्त सजा भुगतेंगे परंतु उनकी गैरजिम्मेदारी की आड़ में हम अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। जब आप अपने बच्चों का प्रवेश किसी स्कूल में दिला दें तो लगातार देखें कि आपका बच्चा क्या सीख रहा है। क्योंकि इस समय उसे जो सीखना चाहिए उसमें भाषायी ज्ञान प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण है। उन्हें एक या दो साल में ही ऐसी भाषायी क्षमता प्राप्त करनी है जिसके आधार पर वह आगे की शिक्षा प्राप्त करेंगे। इसमें शिक्षकों के साथ-साथ उनके माता-पिता और अभिभावकों को बहुत सजग और सावधान रहते हुए परिश्रम की आवश्यलता होती है परंतु बहुत से लोग इतना परिश्रम नहीं कर पाते जिसके कारण बच्चों की शिक्षा अधूरी रह जाती है जो पूरे समाज के लिए नई समस्याएं खड़ी करता है। इसीलिए हमने कहा-शिक्षा के साथ ये क्या हो गया! 
(इस विषय में लेखक का पूर्व प्रकशित आलेख प्राथमिक शिक्षा को रामभरोसे न छोड़ें पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें )

प्रस्तुति- सुरेन्द्र कुमार पटेल
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शनिवार, अगस्त 24, 2019

असफलता, सफलता की सीढ़ी है

     



आपके आसपास ऐसे कई लोग हैं जो सफल हैं और ऐसे भी कई लोग हैं जिन्हें लगता है कि वे असफल हैं। ऐसे लोग जो जीवन में कभी असफल नहीं हुए उनके बारे में आपकी क्या राय है? निश्चित ही ऐसे लोगों के प्रति आपके मन में सम्मान का भाव होता है। कभी असफल न होना दो बातें बताती हैं एक तो यह कि व्यक्ति ने सफलता के लिए पूरे मन से प्रयत्न किए हैं और दूसरा यह कि व्यक्ति ने केवल उतना किया है जिसमें सफल होना उसके लिए पूरी तरह निश्चित था। उसने हद में रहकर ही काम किया है। अक्सर जो हदें पार नहीं करते, उनके लिए असफल होने का खतरा कम होता है। किन्तु दुनिया में चमत्कारिक परिवर्तन हदों में रहने से नहीं बल्कि हदें तोड़ने से आते हैं। इसमें खतरे बहुत अधिक हैं।
असफलता को सबसे सुंदर तरीके से अभिव्यक्त करने वाले एडीसन अल्वा ने एक बार कहा कि वह स्कूल में जो भी सीखते, उसमें नाकाम साबित होते। उन्हें पहली दो नौकरियों से निकाल दिया गया था। ऐसे ही हज़ार नाकामियों के बाद उन्होंने वो कर दिखाया जिसके बाद पूरी दुनिया ने उनका लोहा माना। इस सफलता के बाद उन्होंने कहा, 'मैं हारा नहीं बल्कि मैंने ऐसे हज़ार रास्ते खोजे जिनसे सफलता नहीं मिल सकती'। दुनिया के सबसे अमीर इंसान बनने से पहले बिल गेट्स ने हावर्ड कॉलेज में बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। इसके बाद उन्होंने अपना पहला बिज़नेस शुरू किया जो बुरी तरह असफल साबित हुआ। दुनिया में जीनियस के तौर पर पहचाने जाने वाले वैज्ञानिक आइंस्टीन चार साल तक बोल और सात साल की उम्र तक पढ़ नहीं पाते थे। इस कारण उनके मां-बाप और शिक्षक उन्हें  एक सुस्त और गैर-सामाजिक छात्र के तौर पर देखते थे। इसके बाद उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया और ज़्यूरिच पॉलिटेक्निक में दाखिला देने से इंकार कर दिया गया। इन सब के बावजूद वे भौतिक विज्ञान की दुनिया में सबसे बड़ा नाम साबित हुए। अल्बर्ट आइंस्टीन ने दुनिया को सापेक्षिकता का सिद्धांत दिया। नौकरी के दौरान वॉल्ट डिज़्नी को अख़बार के संपादक ने ये कहकर निकाल दिया कि उनके पास कल्पनाशीलता और नए विचार नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपने व्यवसाय शुरु किए लेकिन दिवालिए हो गए। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और उनके नाम से एक पूरा साम्राज्य चलता है जिसके हम सब गवाह हैं। नोबल पुरस्कार विजेता और दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चुने गए विंस्टन चर्चिल की भी कहानी संघर्ष से भरी है। स्कूली शिक्षा के दौरान चर्चिल 6वीं क्लास में फेल हुए। इसके बाद प्रधानमंत्री बनने से पहले अपने हर चुनाव में वो फेल हुए लेकिन उन्होंने मेहनत करना नहीं छोड़ा। अपनी पूरी ज़िंदगी के दौरान विंसेंट अपनी बनाई सिर्फ एक ही पेंटिंग बेच पाए थे। वो एक भी उनके दोस्त ने बहुत कम पैसों में खरीदी थी। आज विंसेंट कला के सबसे बड़े दिग्गज़ों में गिने जाते हैं और उनकी पेंटिंग्स करोड़ों में बिकती हैं। दु‌निया में अरबों कमाने वाली जुरासिक पार्क जैसी फिल्म के निर्देशक स्पिलबर्ग को एक बार नहीं तीन बार कैलिफॉर्निया की साउदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ थियेटर एंड टेलीविज़न में दाखिले से इंकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने कहीं और से शिक्षा ली और अपने काम के लिए बीच में पढ़ाई छोड़ दी। 35 साल बाद वो दोबारा उस कॉलेज में पहुंचे और ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की।भारत की ओर से नोबल पुरस्कार जीतने वाले महान क़वि और साहित्यकार रबिंद्रनाथ टैगोर स्कूल में फेल हो गए थे। उनके शिक्षक उन्हें पढ़ाई में ध्यान न देने वाले छात्र के तौर पर पहचानते थे। बाद में वही टैगोर देश का गर्व साबित हुए। रबिंद्रनाथ टैगोर ने ही लिखा था कि "हर ओक का पेड़, पहले ज़मीन पर गिरा एक छोटा सा बीज होता है."  
एक हद तक देखा जाए तो जीवन में छोटी-छोटी असफलताएं हमे जाने-अनजाने में बहुत कुछ सिखा कर जाती है जिनसे बाद में हमे एक बड़ी कामयाबी मिलती है। हम ही थे, जिनसे करवटें बदलना नहीं आता था। हम सैकड़ों बार फेल हुए। हमें खड़ा होना नहीं आता था, हम सैकड़ों बार फेल हुए। हमें चलना नहीं आता था, हम सैकड़ों बार फेल हुए। हमें बोलना नहीं आता था, हम फेल हुए। इन सभी बातों को गौर से सोंचेंगे तो पाएंगे कि असफलताएं सफलता की सीढ़ियां हैं। असफलताओं पर चलकर ही हमने सफलता पाई।


हम हर रोज सफल और असफल होते हैं। हम सुबह जागना चाहते हैं परन्तु जाग नहीं पाते। समय से ऑफिस के लिए निकलना चाहते हैं पर निकल नहीं पाते। हम क्रोध नहीं करना चाहते मगर करते हैं। ऐसी अनेकानेक चीजें हैं जिनमें हम हर रोज सफल होते हैं या असफल होते हैं। परंतु सफलता की परवाह किये बगैर हम हर रोज सफल होने के लिए काम करते हैं। जीवन के बड़े कार्यों के प्रति भी हमारा नजरिया यही होना चाहिए। कुछ न करने से, कुछ करके असफल हो जाना सदैव बेहतर होता है। कुछ न करने वाला किसी को कुछ नहीं सिखा सकता। परन्तु एक असफल व्यक्ति यह सिखा सकता है कि वह असफल क्यों रहा। परन्तु ध्यान रहे असफलताएं सीढ़ियाँ ही रहें, आखिरी मंजिल सफलता ही हो।


प्रस्तुति-सुरेन्द्र कुमार पटेल
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शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

मृत्युभोज:एक सामाजिक बुराई

       

    परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद कराया जानेवाला भोज  मृत्युभोज कहलाता है। हमारी सामाजिक परम्पराओं में यह शामिल है। ऐसा माना जाता है कि उसकी मृत्यु के बाद जो भोज कराया जाता है उसका सम्बन्ध उस दिवंगत आत्मा की शांति से है।

        मान्यताएं मानव की कल्पना से उद्भूत है। इनकी वैज्ञानिक परख के बाद यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि इन्हें माना जाना चाहिए या नहीं। आज तक हुए वैज्ञानिक खोजों में से किसी ने ऐसी किसी धारणा का समर्थन नहीं किया जिसमें किसी की मृत्यु के बाद उसका अस्तित्व किसी आत्मा या देह रूप में साबित होता है। हमारे धार्मिक ग्रंथ भी यह सिखाते हैं कि जीव का निर्माण पांच तत्वों से मिलकर होता है और मृत्यु पश्चात जीव इन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। अर्थात वे तत्व अपने मूल स्वरूप में विलीन हो जाते हैं जो पुनः अन्य तत्वों के संयोग से किसी अन्य जीवधारी का निर्माण करते हैं। किंतु उसका पूर्व के जीवधारी से अथवा उसकी स्मृति से उसका कोई संबंध नहीं होता। धर्म और अध्यात्म को मानने वाले लोग भी मृत्युभोज को एक कुरीति के रूप में देखते हैं। किन्तु समाज के अपयश के भय से इस परंपरा का अंत करने का साहस नहीं जुटा पाते। 


      किसी गरीब परिवार के किसी सदस्य का असामयिक निधन होना उस परिवार के लिए दोहरी मुसीबत खड़ा करता है। एक तो उस सदस्य की मृत्यु से उपजा दुःख, और उस दुःख की स्थिति में समाज और अपनी बिरादरी के लोगों को भोज कराने की व्यवस्था। यह भी निश्चित है कि जो जन्मा है उसकी मृत्यु होगी। ऐसे में परिवार की आय का बड़ा हिस्सा इन्ही परम्पराओं के निर्वहन में खर्च हो जाता है। परिवार का सारा अर्थ और व्यक्ति का जीवन इन्हीं परम्पराओं के कुचक्र में नष्ट हो जाता है। समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग इस परम्परा का उन्मूलन चाहता है। 

     मृत्युभोज एक सामाजिक बुराई है इसे खत्म करने के लिए सभी एकजुट हों और शोक वाले घर व परिवार जनों के दुःख का हिस्सा बनें, न कि उनके घर खाने का हिस्सा बनें।



जिस आँगन में पुत्र शोक में विलख रही माता
वहाँ पहुँच कर स्वाद जीभ का तुमको कैसे भाता


पति के लिए चिर वियोग में, व्याकुल युवती, विधवा रोती
बड़े चाव से पंगत खाते, तुम्हें पीड़ा नहीं होती


मरने वालों के प्रति अपना सद्व्यवहार निभाओ
धर्म यही कहता, मृतक भोज मत खाओ


चला गया संसार छोड़कर जिसका पालनहारा
पड़े चेतनाहीन जहाँ पर नन्हे-मुन्हें बच्चे, उनका कौन सहारा


खुद भूखे रहकर भी परिजन तेरहवीं खिलाते।
अंधी परम्परा के पीछे जीते-जी मर जाते।


इस कुरीति (की रीति) का उन्मूलन करने का साहस दिखलाओ।
धर्म यही कहता है दोस्तों, मृतक भोज मत खाओ।


प्रस्तुति :
सरिता पटेल
MBA-Finance.PGPBM- Banking & Insurance
Paraswada, Dhanvantri Nagar, Jabalpur.
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गुरुवार, अगस्त 22, 2019

लालची संतान


    कपूरथा नाम का एक गांव था, जहाँ बलवान सिंह  का परिवार निवास करता था। परिवार में बलवान सिंह और उसकी पत्नी सुनंदा और तीन बेटे थे।
    एक दिन गाँव के नजदीक मेले में बलवान सिंह का छोटा बेटा भान सिंह खो गया। इधर-उधर बहुत खोजने के बाद भी भान सिंह नहीं मिला।
     बलवान सिंह ने अपने दोनों बेटों को गाँव के अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाई। दोनों पढ़-लिखकर नौकरी भी करने लगे। फिर बलवान सिंह ने बड़े धूमधाम से दोनों बेटों की शादी कर दी।
       अब पूरा परिवार बेहद खुश था। दोनों बेटे कमा रहे थे। बलवान सिंह भी अधिक आयु हो जाने के कारण रिटायर होकर घर में रहने लगा।
     इस तरह क‌ई दिनों तक घर में खुशहाली का आलम बना रहा।
     एक दिन दोनों बहुओं के मन में पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का👉 लालच 👈आ गया। उन्हें लगा कि यदि पिता जी अपने जीते जी घर की संपत्ति दोनों भाइयों में बराबर बांट दें तो बहुत अच्छा हो।
      दोनों बहुओं ने अपने-अपने पति को हिस्सा लेने के लिए राजी कर लिया। सुबह बलवान सिंह आँगन में बैठकर चाय पी रहे थे, तभी बड़ा ‌बेटा आया और बोला- पिताजी आपसे एक बात कहनी थी। तभी दूसरा बेटा भी आ गया और बोला जी, पिता जी! मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। पिताजी बोले आप दोनों  क्या कहना चाहते हो?
   दोनों बेटों ने एक साथ कहा कि हमारी पत्नियां चाहती हैं कि समय रहते घर का हिस्सा बांट कर दिया जाय।
    बलवान सिंह ने दोनों की बात सुनकर असहज महसूस करते हुए आंखों में आंसू लिए हुए फैसला सुनाया कि - मैं जीते जी परिवार का विघटन नहीं होने दूंगा। मेरे मरने के बाद आपको जो करना होगा करते रहना।
      फैसला सुनते ही बेटों के पैरों तले जमीन खिसक गयी और दोनों बहुएं अपना- अपना सामान लेकर घर से बाहर निकलने लगीं और बोलीं कि  हम अब इस घर में एक पल भी नहीं रहना चाहते।
   इस प्रकार दोनों बेटे घर छोड़कर पत्नियों के साथ चले गए। एक दिन बाद सुनंदा की तबीयत अचानक बिगड़ गई और बलवान सिंह पूरी तरह से हताश-निराश होकर भूखे  रहने को विवश  था।
      अचानक किसी ने दरवाजा खटखटाया और कहा- पिताजी मैं भान सिंह आ गया हूं, दरवाजा खोलिए।
      भान सिंह की बात सुनकर बलवान सिंह को ताकत आ गई। बिछुडे हुए बेटे से मिलकर माता सुनंदा की तबीयत भी ठीक हो ग‌ई।
      भान सिंह ने अपने दोनों भाइयों के बारे में पूछा तो पिताजी ने पूरी कहानी सुनाई।
    भान सिंह माता-पिता की अच्छी सेवा करने लगा।
     एक दिन उन दोनों बेटों को पता चला कि हमारा तीसरा भाई पुनः घर में आ गया है, तो हमें भी घर में जाकर माता-पिता की सेवा करनी चाहिए नहीं तो पैतृक संपत्ति से बेदखल हो जाएंगे।
     दोनों बेटे पत्नियों के साथ घर आकर माता-पिता की खूब सेवा करने लगे। क‌ई दिनों बाद पुनः हिस्सा बांट करने की बात आई तो बलवान सिंह ने कहा-मैंने अपनी पूरी सम्पत्ति तीसरे बेटे भान सिंह के नाम कर दिया है । क्योंकि वह बुरे वक्त में हमारी सेवा की है। तुम दोनों को फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगा। लालची बहुएँ शर्म से झुक कर अपने किए हुए कर्मों का प्रायश्चित करने लगीं।
निष्कर्ष👉अपने माता-पिता की सेवा निःस्वार्थ भाव से करने से ही "सेवा का मेवा" प्राप्त किया जा सकता है। सच है लालच बुरी बला होती है।

प्रस्तुति-धर्मेन्द कुमार पटेल, नौगवां✍✍
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आदतों के गुलाम


  
   हमारे शरीर से जुड़ी अनेक रोचक बातों में एक आदत निर्माण की प्रक्रिया भी है. प्रायः हम यह कहते सुनते हैं कि क्या करें, यह हमारी आदत हो गई है. हम ऐसा कहना तो नहीं चाहते परन्तु हमारी आदत है. यह भी कहते सुने होंगे कि तम्बाकू हम नहीं खाना चाहते परन्तु क्या करें हमारी आदत हो गई है. कुछ की खाने संबंधी आदतें हैं, कुछ की बोलने सम्बन्धी आदतें हैं, कुछ की हर किसी की बात को टोकने की  आदतें हैं, कुछ की ज्यादा सोने की आदत है. कुछ की टीवी देखने की आदत है, कुछ की व्यर्थ की बातें करने की आदत है. सच तो यह है कि एक आदमी और दूसरे आदमी में जो अंतर है वह उसकी आदतों का ही अंतर है. और आदमी कुछ नहीं बल्कि बहुत सारी आदतों का समुच्चय है. जहाँ तक हमारी आदतें हमारे जीवन के लिए लाभप्रद और औरों के लिए अनुकरणीय हैं, वहां तक आदत समस्या नहीं है. परन्तु जिन आदतों से स्वयं का और अन्यों की हानि हो रही हो या किसी प्रकार की समस्या हो रही हो उन आदतों से हर कोई पीछा छुडाना चाहेगा. पर कैसे?
    समस्याग्रस्त आदतों की समस्या सिर्फ यही नहीं है कि वह हमारी आदत है. समस्या यह है कि हम अपनी आदतों से दूसरों की आदतों का निर्माण करते हैं. हम जिन दूसरों की बात कर रहे हैं वह कोई दूसरे नहीं बल्कि वह हमारे ही अपने सगे संबंधी होते हैं हमारे पुत्र-पुत्रियाँ और हमारे ही भाई-बहन..
     उन लोगों के लिए इस बात की चर्चा का कोई महत्व नहीं है जो आदतों को बहाने के ढाल के रूप में इस्तेमाल करना चाहते  हैं. शेष जो वाकई आदतों से ही मजबूर हैं, उनके लिए आदत निर्माण प्रक्रिया की बात करना सार्थक हो सकता है. उन्हीं को ध्यान में रखकर बात को आगे बढाते हैं.
      हमारा मष्तिष्क कभी किसी बात को तब तक स्वीकार नहीं करता जब तक कि उसे स्वीकार करने का समुचित तर्क नहीं दिया जाए. यदि खाने के एक पैकेट को आपके सामने रखा जाय  और कहा जाय लीजिये खाइए- तो आपका पहला प्रश्न होगा  यह क्या है? यह प्रश्न तभी होगा जब आपके सामने रखा गया पैकेट आपके लिए अपिरिचित हो. उसी पैकेट को यदि आपको कभी पुनः दिया जाए तो आपका मष्तिष्क पहली की घटना से सन्दर्भ प्राप्त कर परीक्षण कर लेगा कि यह वही पैकेट है जो पहले आपने उपयोग किया है. केवल यही नहीं आपका मष्तिष्क इस पैकेट की सामग्री के उपयोग के प्रभाव का भी मिलान कर लेगा और इसलिए यदि इससे बहुत अधिक नुकसान नहीं हुआ हो तो इस पैकेट के बारे में ज्यादा चिंतन नहीं करेगा और पहले की अपेक्षा कम समय में इसे स्वीकार कर लेगा.
     अभी हमने मष्तिष्क की बात की है. जब  आप लगातार किसी एक गतिविधि को करते-रहते हैं  तो हमारा मष्तिष्क उस  गतिविधि के बारे में निर्णय का अधिकार खो देता है. तब जिन शारीरिक अंगों के माध्यम से वह गतिविधि होती है वह शारीरिक अंग स्वतः ही मष्तिष्क का अनुमति प्राप्त किये बिना  उस गतिविधि में शामिल हो जाते हैं. इसे शरीर का ऑटो मोशन में जाना कह सकते हैं. अब सब कुछ आटोमेटिक होता है. किसी गतिविधि का इस हद तक पहुँच जाना बहुत खतरनाक होता है. अब आप चेतनाशून्य हो चुके हैं. आप मृतप्राय हैं. आपके मष्तिष्क को लकवा मार गया है. आपके अंगों का सम्बन्ध मष्तिष्क से नहीं रह गया है. अब आप आदत के गुलाम हो गये हैं.
इस प्रकार आदत व्यक्ति की वह अवस्था होती है जब उसके मष्तिष्क का पूर्ण नियंत्रण शरीर पर नहीं रहता. वास्तव में, मष्तिष्क न तो मृत होता है, और न ही उसका शरीर के अंगों से नियंत्रण समाप्त होता है परन्तु मष्तिष्क उस सन्देश पर काम कर रहा होता है, जिस सन्देश के साथ आपने उस  गतिविधि को प्रारम्भ किया था. पहली बार जब आपने तम्बाकू का सेवन किया था, तब आपने तम्बाकू खाने के पीछे कोई कारण मान लिया था. मष्तिष्क ने आपके उस कारण को हमेशा के लिए लॉक कर लिया. अब वह मान गया कि आपको तम्बाकू क्यों खाना चाहिए, इसलिए उसने प्रश्न करना बंद कर दिया. अब आप तम्बाकू खा रहे हैं. क्यों? पता नहीं. अब आप ऑटोमैटिक तम्बाकू खा रहे हैं. आप तम्बाकू खाने के गुलाम हो गये हैं.
    कुछ बच्चों की देर तक सोने की आदत होती है. वह इसलिए कि जल्दी उठने की जरूरत उनके मष्तिष्क तक  प्रभावी तरीके से कभी पहुँची ही नहीं. प्रारम्भ में बच्चों को अधिक सोने की जरूरत होती है. लेकिन यदि उसे जागने का महत्व कभी समझाया नहीं गया तो बाद में भी, जबकि अब उसकी सोने की जरूरत कम हो गई है, वह अधिक और देर तक सोता है... मष्तिष्क को पूर्व में मिला सन्देश कि देर तक और अधिक सोना फायदेमंद है, उसे जगाने की चेष्टा ही नहीं करता. नींद अपना काम कर रही है. आदमी आटोमेटिक सिस्टम में है.
    जिन गतिविधियों से आदतों का निर्माण होता है पहले उसका भान मस्तिष्क को होता है, फिर उन गतिविधियों के आधार पर हमारे शरीर के चयापचय और मांशपेशियों में कुछ ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं जो उन गतिविधियों को शरीर की जरूरर बना देते हैं. यह सब प्रकृति के नियम के अनुसार ही है. प्रत्येक जीव के शरीर में परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करने का गुण पाया जाता है इस बदलाव को ही अनुकूलन कहते हैं.शरीर को अनुकूलन की अवस्था में लाने के लिए ही वह गुण या गतिविधि जो आप अपनाते हैं आपके शरीर की आदत बनती है. परन्तु इन आदतों से जब व्यक्ति का नुकसान होना प्रारम्भ होता है, तब उसे इस बात का एहसास होता है कि उसने जिस गैर जरूरत को जरूरत बना लिया वह तो पहले से ही शरीर के लिए आवश्यक नहीं था. और वहाँ से व्यक्ति आदतों से छुटकारा पाने की पहल करना प्रारम्भ करता है.
    ख़राब आदतों का निर्माण यत्न पूर्वक ही हुआ था. किसी पहली घटना से इसकी शुरुआत हुई थी. लगातार पुनरावृत्ति के कारण यह आदत बनी. खराब आदतों का त्याग और अच्छी आदतों का निर्माण भी इसी प्रक्रिया का पालन करने से होगा. पहले शुरुआत करनी होगी, फिर इसकी पुनरावृत्ति करनी होगी. ख़राब आदतों का त्याग कठिन इसलिए होता है कि इसकी शुरुआत जिस धूम-धाम और जज्बात के साथ होती है, वैसा इसे छोड़ने में मष्तिष्क अनुभव नहीं करता. किसी खराब आदत को छोड़ने में हमेशा ही द्वंद होता है. आधा विचार छोड़ने का होता है और आधा विचार नहीं छोंड़ने का. किसी खराब आदत को छोड़ने के पीछे मष्तिष्क को प्रभावी सन्देश नहीं दिए जाते. यदि आप किसी आदत को छोड़ना चाहते हैं तो इस आदत के पड़ने से अधिक मजबूत कारण छोड़ने के देने होंगे. अन्यथा  एक दिन छोंड़ेंगे और अगले दिन फिर वही आदत पकड लेंगे.
     पढना, और अधिक लगन से पढना भी आदत का हिस्सा है. यह आदत व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी. बिहार और उत्तरप्रदेश के बच्चों में अधिक परिश्रम से पढने की चर्चाएँ मशहूर हैं. उनके मष्तिष्क को प्रारम्भ से ही पढने की जरूरत का सन्देश प्रभावी तरीके से पहुंचा दी जाती है. उनके आसपास ऐसे परिश्रमी छात्रों का समूह होता है, जो लगन और परिश्रम से पढ़ते हैं. उनके सभी के पढने की सामूहिक आदत से व्यक्तिगत आदत का निर्माण होता है और यही व्यक्तिगत आदत सामूहिक आदत निर्माण में सहयोगी होता है. आपके आसपास पढाई का माहौल न होना, आपके बच्चे को हतोत्साहित करेगा. क्योंकि बच्चे को पढने के लिए जिस सामूहिक आदत से पढने की व्यक्तिगत आदत का निर्माण करना था उसका अभाव है. ऐसे में बहुत हद तक यह संभव है कि आपका बच्चा  उन आदतों को सीख ले जो उस माहौल में सामूहिक आदतों के रूप में विद्यमान है.
    इन आदतों के बड़े स्वरुप से उस क्षेत्र विशेष की पहचान बनती है. आप देखते हैं हर शहर-कसबाई लोगों की एक खास पहचान होती है. कुछ सार्व गुण होते हैं जो उस क्षेत्र के सभी या अधिकांश लोगों में पाए जाते हैं. इनमें से बहुत से गुण अच्छे नहीं होते और वह उस क्षेत्र के लोगों के कुख्यात होने के कारण बनते हैं. ...

     आपकी कोई भी आदत हो, जिसे आप वाकई छोड़ना चाहते हैं. कठिन नहीं है. आपको सजग रहना पडेगा  बस. जब भी आप उसी आदत की तरफ बढ़ रहे हों, स्वयम को एक बड़ा कारण दें, उसे आप क्यों छोड़ना चाहते हैं? निश्चित रूप से जिस भी आदत को आप छोड़ना चाहते हैं, कोई बड़ा कारण होगा. नहीं तो बड़ा कारण बनाइए. आपको तम्बाकू छोड़ना चाहिए क्योंकि इससे कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होती है और लोगों की जान जाती है. .. . आपके नहीं जाएगी, किन्तु तम्बाकू खाने की आपकी यह आदत औरों के आदत का निर्माण करेगी और वह कैंसर का शिकार हो जायेगा. वह और कोई नहीं आपका कोई अपना भी हो सकता है. जब आपका मष्तिष्क किसी आदत के प्रारंभ में ही आपसे प्रश्न करे तभी आप रुकें और गलत आदत का निर्माण हो, ऐसी शुरुआत ही न करें.
(विशेष आग्रह ......कृपया इस लेख पर एक बार फिर पधारें, इसका शेषांश भी है)

प्रस्तुति-सुरेन्द्र कुमार पटेल 
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