शोभा न पाता है
बिना आयुध के रन में शूर भी शोभा न पाता है।
बिना मंत्री के राजवाड़ा सुशासन कर न पाता है।
बिना शक्ति के कोई स्वामी सियासत दुर्ग के बिन हो।
बिना दांतों के हाथी भी कभी शोभा न पाता है।
बिना बुद्धि के कोई मानव या मानव धर्म के बिन हो।
बिना महकाई के फ्लावर कभी शोभा ना पाता है।
हो छाया बिन कोई तरुवर जो फल भी दे नहीं सकता।
जलासय हो बिना जल के कभी शोभा ना पाता है।
बिना लज्जा के कुल की हो वधू, मद के बिना हाथी।
बिना नीती के हो राजा कभी शोभा ना पाता है।
बधिर होवे अगर मंत्री हो अलसाया स्वयं भूपति।
नरमता के बिना शिष्य भी कभी शोभा ना पाता है।
लवण रहिता अगर भोजन क्षमा बिन होवे विज्ञानी।
बिना रफ्तार के घोटक कभी शोभा ना पाता है।
बिना उद्यम के ना खेती बिना पानी के ना फसलें।
बिना उत्तम के बीजों के अन्न उन्नत न पाता है।।
गगन मंडल बिना तारे प्रखर आभा बिना सविता।
बिना सम्मर्द जन मेला कभी शोभा ना पाता है।
पुताई बिन कोई बिल्डिंग रंगाई बिन कोई प्रतिमा।
कुशल नेतृत्व बिन मुखिया कभी शोभा ना पाता है।
बिना हो शिष्य के गुरुवर बिना भक्तों के हों भगवन।
बिना देवों के देवालय कभी शोभा ना पाता है।
बिना पति के कोई पत्नी बिना पत्नी के कोई पति भी।
सहोदर बिन कोई सहचर कभी शोभा ना पाता है।
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (म.प्र.)

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