शनिवार, जनवरी 31, 2026

प्रेम: कविता

प्रेम — राम सहोदर पटेल

प्रेम

— श्री राम सहोदर पटेल
दोहा
प्रेम बनाए काम सब, प्रेमहि सुख आधार ।
वशीकरण यह प्रेम है , प्रेम जीवनाधार ।।
चौपाई
प्रेम से प्रेम बढ़े दिन दूना। प्रेम बिना यह जीवन सूना।। प्रेम प्रसंग पवित्र पियारा। प्रेम पराग मधुप पग धारा।। प्रेम पियासे सुर नर मुनि सब। प्रेमहि बसी भये खगमृग सब।। प्रेम के बसी होहि भगवंता। प्रेम में रति का बास अनंता। प्रेम से राष्ट्र अमित अखंडा। प्रेम दिलावे नहि कछु दंडा।। दंपति प्रेम कुटुंब सुधारहि। संपत्ति प्रेम शकल निस्तारहि।। कर्तव्य से प्रेम प्रतिष्ठा देई। लोगन प्रेम सुखद फल होई।। प्रेम का भूखा हर नर नारी। प्रेम से मिले महातम भारी।।
दोहा
जे निज स्वारथ रत रहहि, करे न कछु उपकार।
ते नर पशुवत जियत हैं, पावत नहिं सत्कार ।।
चौपाई
प्रेम सकल रस की है खाना। प्रेमहि बसी होहि भगवाना। प्रेम अकर्षण और उजाला। प्रेम उमग उत्साह का प्याला। प्रेम दिलों दिल का है मेला। प्रेम स्वभाविक भावुक खेला। प्यार मोहब्बत नाम अनेका। स्नेह इश्क लव एक से एका। ढाई आखर का यह नामा। व्यापक अर्थ शकल सुख धामा जाकी होहि भावना जैसी। प्रेम प्रकट होवे तिन तैसी।। प्रेम बीज अंकुरन समाना। तरुवर होहि फूल फल नाना।। धरणी मन उपजाऊ जैसे। प्रेम फले मन तरुवर तैसे ।।
दोहा
अपनापन ही प्रेम है, प्रेम समर्पण भाव ।
प्रेम समन्वय भाव का, संकट प्रेम बचाव ।।
चौपाई
प्रेम होय दुख-सुख का साथी। प्रेम से शीतल हो द्विछाती।। परम पवित्र है प्रेम पिपाशा। अंतर्मन अभिव्यक्ति दिलासा।। प्रेम न टूटे काहू तोड़े। प्रेम बसी होवे हैं जोड़े।। प्रेम बिखरना नहीं चाहता। लेकिन निष्छल भाव चाहता।। प्रेम शक्ति है प्रेम भक्ति है। निस्वार्थ चाह की अनुरक्ति है।। मानव को मानवता देता। जीवन को अनुशासन देता ।। प्रेमहि जीवन हो आबादा। कपटी प्रेम करे बरबादा ।। निश्छल प्रेम करे जो कोई। जीवन शकल जनम फल होई।
दोहा
तन-मन-धन सब प्रेम है, प्रेम मानवी मूल्य।
प्रेम बिना सृष्टि नहीं, प्रेम प्रकृति अनुकूल ।।

प्रेम रंग व्यापक अती, प्रेम बिना सब सून।
प्रेम ही जीवन मृत्यु है जीवन प्रेम सुकून
चौपाई
वत्सल प्रेम माता उपजाये। गुरु प्रेम मारग दिखलाये।। जीवन साधे प्रेम पिता का। जग साधे ज्यों लौ सविता का।। परिजन प्रेम उठाये ऊपर। ज्यों गिरिवर चोटी ले ऊपर।। सभ्य समाज सो प्रेम बढ़ाये। सदा सुखी आनंद मनाये।। प्रेमहि प्रेम बढ़े दिन राती। प्रेम बिना नहीं ठंडक छाती।। राष्ट्र प्रेम सम नहीं कछु सेवा। यह विचार मन में धरि लेवा। प्रेम भार्या जीवन साथी। जिससे जीवन होवे हाथी ।। सुत का प्रेम बुढ़ापा साधे। सुता प्रेम रिश्ता में बांधे।।
दोहा
प्रेम सहोदर राखिए, सब सो नित प्रति जोय।
प्रेम तार टूटे नहीं, राखहु याहि संजोय ।।
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सोमवार, जनवरी 26, 2026

कविता: शोभा न पाता है

शोभा न पाता है

बिना आयुध के रन में शूर भी शोभा न पाता है।
बिना मंत्री के राजवाड़ा सुशासन कर न पाता है।
बिना शक्ति के कोई स्वामी सियासत दुर्ग के बिन हो।
बिना दांतों के हाथी भी कभी शोभा न पाता है।

बिना बुद्धि के कोई मानव या मानव धर्म के बिन हो।
बिना महकाई के फ्लावर कभी शोभा ना पाता है।
हो छाया बिन कोई तरुवर जो फल भी दे नहीं सकता।
जलासय हो बिना जल के कभी शोभा ना पाता है।

बिना लज्जा के कुल की हो वधू, मद के बिना हाथी।
बिना नीती के हो राजा कभी शोभा ना पाता है।
बधिर होवे अगर मंत्री हो अलसाया स्वयं भूपति।
नरमता के बिना शिष्य भी कभी शोभा ना पाता है।

लवण रहिता अगर भोजन क्षमा बिन होवे विज्ञानी।
बिना रफ्तार के घोटक कभी शोभा ना पाता है।
बिना उद्यम के ना खेती बिना पानी के ना फसलें
बिना उत्तम के बीजों के अन्न उन्नत न पाता है।।

गगन मंडल बिना तारे प्रखर आभा बिना सविता।
बिना सम्मर्द जन मेला कभी शोभा ना पाता है।
पुताई बिन कोई बिल्डिंग रंगाई बिन कोई प्रतिमा।
कुशल नेतृत्व बिन मुखिया कभी शोभा ना पाता है।

बिना हो शिष्य के गुरुवर बिना भक्तों के हों भगवन।
बिना देवों के देवालय कभी शोभा ना पाता है।
बिना पति के कोई पत्नी बिना पत्नी के कोई पति भी।
सहोदर बिन कोई सहचर कभी शोभा ना पाता है।

✒️
कलमकार
राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (म.प्र.)
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शनिवार, जनवरी 24, 2026

तुलना का शोर

जिंदगी की असंतुष्टि की सारी वजह, बस एक — बेमेल तुलना है। हर इंसान अपने खालीपन को भरने, झांकता है किसी और की जिंदगी में, जहाँ उसे दिखते हैं रंग, रौशनी, हँसी — और वह भूल जाता है कि हर उजाले के पीछे एक परछाई होती है। वह तुलना करता है अपने खालीपन की, और पाता है दूसरों की झोली में कुछ न कुछ भरा हुआ। फिर मन कह उठता है — “काश! वैसा जीवन मेरा होता।” पर वह नहीं देख पाता, दूसरे की आँखों में छिपा वही खालीपन, जो उसके अपने जीवन से भी गहरा है। एक आदमी देखता है किसी संत को — मौन, शांत, निर्मल। सोचता है, "कितना सुखी होगा यह!" पर वह नहीं जानता, संत का सुख ही नहीं, संत की पीड़ा भी केवल संत को ही मिल सकती है। बाहर दिखती शांति, अंदर तपता हुआ व्रत होती है। एक शासन का सेवक देखता है व्यापारी को, जिसके पास धन की नदी बहती है। वह मन ही मन कहता है, "क्यों मेरी तिजोरी खाली है?" पर वह भूल जाता है — भरी हो ही नहीं सकती, बिना व्यापारी हुए, बिना उसके जोखिम, उसके डर, उसकी नींद और उसकी रातों के जागरण के। हर कोई किसी और का जीवन चाहता है, जैसे कोई बच्चा चाँद को छूना चाहता है। पर जो जीवन हमारे भीतर धड़कता है, वही सबसे सच्चा, सबसे उपयुक्त है। कभी ठहरकर देखो — जो कुछ तुम्हारे पास है, वह किसी और की कमी हो सकता है। जो तुम्हें अधूरा लगता है, वह किसी और का पूरा सपना हो सकता है। जीवन का अर्थ तुलना में नहीं, स्वीकार में छिपा है। जो अपने हिस्से की धूप और छाँव को एक साथ जीना सीख ले, उसी के भीतर भर जाती है शांति। बाकी सब — बस दूसरों की खिड़कियों में झाँकने का शोर है।
रचनाकार:
सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी जिला शहडोल
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श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें: कविता

विषय - श्रेष्ठाचरण सुशोभित करें

दुष्ट की दुष्टता कभी जाती नहीं,
चाहे कितनी भी विद्या सुशोभित करे।
विष को विषधर न छोड़े किसी हाल में,
क्यों न मणि ही वह मुख में सुशोभित करे।

समझो दारा पराई सदा मातृ सम,
न परद्रव्य हरगिज सुशोभित करे।
मन में सोचो सदा कार्य अच्छा बने,
श्रेष्ठ उद्यम ही मन में सुशोभित करे।

सुस्त सोने से सिद्धि नहीं मिलती कभी,
सिद्धि चाहो तो जागृति सुशोभित करे।
आत्म सम सभी प्राणियों को समझो सदा,
खुदा खुद ही खुदाई सुशोभित करे।

मुख से वाणी निकालो सदा छानकर,
वाक्य वेदों के दिल में सुशोभित करें।
आचरण को सुधारो मणि की तरह,
सभी लोहा को सोना सुशोभित करे।

कार्य संभव हो, निश्चित उसी को करो,
दुविधा वाले कर्म न सुशोभित करें।
मन मरुस्थल न बन जाए संयम बिना,
शीलता, नम्रता, सत्य सुशोभित करें।

समय नाहक न खर्चो, ये मिलता नहीं,
समय जीवन समझकर सुशोभित करो।
अच्छा देखो सदा, सदा अच्छा सुनो,
बनो अच्छा ही अच्छा सुशोभित करो।

तजो जीरो को तुम सदा हीरो बनो,
आचरण से बड़प्पन सुशोभित करो।
क्रोध शत्रु भयानक, रहो इससे बच,
क्षमा करने का गुण ही सुशोभित करे।

कर्म ही पूजा है, धर्म सत्कर्म है,
बस सहोदर की सिखावन सुशोभित करे।


✍️ कलमकार

राम सहोदर पटेल, "शिक्षक"
हाई स्कूल नगनौडी, संकुल - आमडीह
जिला शहडोल (मध्य प्रदेश)

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रविवार, जनवरी 18, 2026

एक प्रेम गीत

एक प्रेम गीत

कभी वक्त मिले तो आना,
दरिया किनारे बैठ तुम्हें,
इश्क के अल्फाजों को
कविता बना सुनाऊंगा।
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो
किसी और का हो जाऊंगा।
हां इश्क है, बताया नहीं तुमसे;
अगर तुमको था, तो जताया क्यों नहीं तुमने?
दिल की बातें तुम सुनती कहां हो?
आंखों को मेरे तुम पढ़ती कहां हो?
बातों में मेरी तुम उलझती कहां हो?
तुम, तुम, तुम... हां तुम!

सिर्फ इश्क मेरा तुमसे है।
अगर आज मैं बता दूं तो,
क्या तुम मेरी हो जाओगी?
मेरी आंखें, मेरी बातें, क्या तुम समझ पाओगी?
मेरे चेहरे को, क्या तुम पढ़ पाओगी?
हां करूंगा इश्क, सिर्फ तुमसे,
तुम जता के तो देखो।
तुम्हारी सांसों में न पिघल जाऊं तो कहना,
तुम्हारी धड़कन न बन जाऊं तो कहना।
मैं इश्क का आवारा परिंदा हूं,
मुझे अपने दिल के पिंजरे में कैद कर लो।
कहीं उड़ जाऊं तो मेरा दोष मत देना।
चलो तुम्हें इश्क के अल्फाजों को,
कविता बना सुनाऊंगा;
समझ गई तो मैं तेरा, नहीं तो किसी और का हो जाऊंगा।

रचनाकार

नाम: अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)

परास्नातक: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)

ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com

पता: कदवा, नवगछिया, भागलपुर (बिहार) - 853204

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मन केय पंछी

मन केय पंछी

(अंगिका रचना)

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

धुरदा-धुईयां धूप केय साथे,
गिट्टी से रिश्ता पैलहियों;
हवा मोड़ी केय दौरी घूपी केय,
छाया मेय भी हड्डी सुखैलिहों।

समय केरो चक्र ऐन्हो चल्लहों,
खुद के झोंकी देलहियों;
प्लेटफार्म पर खड़े रही गेलहियों;
छुटी गैलहों सब गड़िया,
की पाय केय रहे, की पाय लेलहियों—
सब ताकतेंह रही गेलहियों।

चारो तरफ रोशनी,
तैय्यो भीतर बहुत अंधेरा छैय;
उच्चकवा पहाड़ो पर बैठलो,
मन केय पंछी बहुत अकेला छैय।

रचनाकार

अंगरक्षक सूरज (सूरज कुमार सोनी)

शिक्षा: परास्नातक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)

ईमेल: angrakshaksuraj2001@gmail.com

स्थान: कदवा, नवगछिया, भागलपुर, बिहार (853204)

यह रचना बिहार के अंग प्रदेश (भागलपुर, मुंगेर, बांका) की मधुर मातृभाषा अंगिका में है।
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लूट की कला

लूट की कला

यदि उन्हें मैं सीधे-सीधे व्यापारी कहता,
वे पुरज़ोर विरोध करते।
मैं इसे गलत नहीं मानता कि वे
धन कमाने में बड़े जतन से लगे हैं।

मेरे आसपास के ही ये लोग
अक्लमंदी की परीक्षा देकर आए थे,
क्योंकि उनके पास सेवा-संबंधी
एक से बढ़कर एक कौशल प्रमाणपत्र थे।

अब जब मैं उन्हें देखता हूँ —
किसी एक को नहीं, सभी को भी नहीं,
परंतु उनमें से बहुतों को —
तो पाता हूँ कि उनकी सारी अक्लमंदी,
उनका सारा कौशल
बस एक ही कला का है —
पैसे कमाने का।

उनके पास यह कौशल है
कि वे अनीति का धन
कुछ इस तरह अर्जित करते हैं
कि वह अनीति न लगे।

हालाँकि वे लुटेरे ही हैं, किंतु लूटते नहीं।
पट्टी पढ़ाते हैं कुछ ऐसी,
कि इंसान खुद लुटने को तैयार हो जाए।

वे हाथ बाँधकर, नतमस्तक होकर कहते हैं —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं करना हमें।”
और इंसान गिड़गिड़ाता है —
“नहीं, नहीं, यह पाप नहीं है,
जब हम स्वयं समर्पित हैं आपके समक्ष।”

यह कौशल इतना व्यापक है
कि इसमें प्रवीण हैं —
छोटे से लेकर बड़े तक,
तंत्र के हर कलाकार।

— सुरेन्द्र कुमार पटेल
ब्यौहारी, जिला शहडोल
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नीतिपरक दोहे

नीतिपरक दोहे – राम सहोदर पटेल
*नीतिपरक दोहे*
++++++++++
बातन से बातें बने, बातन बात नशाय।
बातन से गौरव मिले, बातन लात दिलाय।।
फरिका करत बयान है, भीतर की सब हाल।
ताल नीर मैलो दिखा, प्यास भगे तत्काल।।
मन मैंला जब होत है, बाहर से दिख जात।
कूड़ा दरवाजा पड़ी, भीतर की क्या बात।।
दरवाजे कचरा पड़ा, भीतर कचरा होय।
भीतर वाहर एक सम, जान परत सब कोय।।
अनपढ़ की संगोष्ठी, अरु दुर्जन का साथ।
जबरा केरी मित्रता, निश्चित करें विहाथ।।
अहं प्रेम दोनों अरी, दोनों रहें न संग।
एक रहे दूजा भगे, या होबेगा जंग।।
एक बेर तरु के लगे, बेर-बेर फल होय।
फल चाखे नर तोष से, सिद्ध जनम फल होय।।
विनय सहोदर करत है, जाय सहोदर पास।
मोहि सहोदर मान कर, राख सहोदर खास।।
चंचल मन चंचल सदा, रहे न स्थिर जान।
चंचल जल की भांति है, संयम से रख ध्यान।।
मानुष पानी के गये, बैठन को नहीं ठौर।
पानी जतन बचाबहू, गर चाहो निज मौर।।
अंबर घन बरसे बरुण, गिरि पीतांबर धार।
अंबर भी भीगा नहीं, इंद्रदेव गे हार।।
चिकनी चुपड़ी बात में, छिपी कपट जंजाल।
सुंदर फूल गुलाब के, कांटे खींचें खाल।।
जान हथेली पर लिए, सीमा पर जो ज्वान।
धन्य मात वह जन्म दे, किया बड़ा एहसान।।
कड़वी बोलन की सजा, खीरा जैसा होय।
अलग किया सिर काटकर, निंदत हैं सब कोय।।
अहंकार दुश्मन बड़ा, करे समूल विनाश।
धरा रह गया राजपद, दुर्योधन के पास।।
नारी के अपमान से, बच नहीं पाया कोय।
चीर हरण के कारणे, दुर्योधन गया खोय।।
रेती की दीवार हो, हवा लगे ढह जाय।
ओछे की ज्यों दोस्ती, स्थाई न रह पाय।।
कर्म करो औकात भर, कार्य सफल निति होय।
गर सीमा बाहर हुए, हंसी करें सब कोय।।
मदिरा सेवन के किये, मान जाए तब टूट।
धन-बल यश का नाश हो, प्रेम सबों से छूट।।
समय अपव्यय मत करो, यह जीवन का सार।
समय गये मिलता नहीं, फिर जीवन निस्सार।।
हीरो बनना सीख तू, जीरो को कर दूर।
जीरो यदि खोया नहीं, हीरो चकनाचूर।।
देखो अच्छा सब जगह, अच्छा बनना सोच।
अच्छा करना कर्म सब, बुरा न रखना सोच।।
लूट किया सब बेशरम, छिपा बेशर्म ओंट।
बना बेशरम लाज ताज, गया बेशर्म सोंट।।
+++++++++++
✍️ राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल (मध्यप्रदेश)
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शनिवार, जनवरी 17, 2026

मुक्तक : रजनीश कुमार


कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कविताएँ — रजनीश कुमार जायसवाल

कौन धुलेगा...? तुम्हारा पाप! पीड़ित जनता!! और शोषण से तपाए लोग!! कौन...? कब तक तड़पाएगा वह... हम निरीह प्राणियों को?
देखिए! टोपीधारियों को — निर्लज्ज! भकोस रहे हैं गरीबों की माटी को। पसीना गाढ़ा करना इन्हें क्या मालूम, अपनी बचाकर खेलते हैं दूसरों के फूलों से।
मेरे देश की घानी में तेल नहीं, गुलेल निकलते हैं... कभी वाणी-विष के, तो कभी निशाचरों के धारदार... नाखूनों से बोलती ज़हर की हिंसक ध्वनि।
आंधियों के लप्पड़ से देह सूखी डालियों की तरह चरमर हो गई है, और नीले रंग के गरीबी के थप्पड़ उभर गए हैं।
शोषणाधारियों के मुख में सड़े दही की गंध और गोबर की चोंथ उसी तरह शोभित है, जिस तरह पानी में सड़ने वाले चमड़े और मरे मच्छरों की लादियाँ।
फेसबुक टाइमपास का वह दाना है जिसे रोपित करने पर केवल मनरस के पौधे ही तैयार होते हैं। कैक्टस की तरह हमारे सुसमय को सोखकर यह हमारे उर्वर जीवन को बंजर बना देती है।
हवा की बदबूदार ‘सुगंध’, सड़े मवेशियों की मीठी गंध उन्हें समर्पित है जो दिन को रात और रात को दिन बड़े चावभरे प्रमाद से उच्चारते हैं।
फटे-बदहाली में अमीरी की कहावत ज़हर की पुड़िया है। ये नखविषधारी कौन हैं? मेरे देश की भाषा मौन है।
मैं नहीं टोहता सौंदर्य को, टाँकता हूँ मैं लोगों के मन को। हवा की सफ़ेदी से जलाता हूँ बुझी बत्तियों को।
गरीबी के चेहरे में लाचारी के टिक्के हैं। क्यों उपजाते हैं कुर्सीधारी अपने शोषण के खेत में मक्कारी के दाने?
क्यों निर्धनता की कोख में भूख तीखी होती है? सूझता क्यों नहीं जीवन की बारहखड़ी? ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में ‘ज़ेड’ बड़ी दूर है।
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम + पोस्ट: झारा, तहसील: सरई
जिला: सिंगरौली (म.प्र.)
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जब बेजुबान बोलेंगे

जब बेजुबान बोलेंगे

कभी-कभी तंत्र को देखकर विस्मय होता है, यह कैसा तंत्र है — जो ख्याली बातें करता है, डींगे हांकता है, पर जिम्मेदारियों से भागता है। कुछ हद तक उन लोगों में मैं भी शामिल हूं, क्योंकि अगर उनकी तरह न रहूं — तो उनके बीच सांस लेना भी कठिन हो जाए। वे चटकारे लेकर बातें करते हैं, हंसी उड़ाते हैं उन पर, जो जिम्मेदारी की कुर्सियों पर बैठे हैं, और खुद कुछ करना नहीं चाहते। जब बात आती है अपनी जिम्मेदारी की, तो वे चुप कराने लगते हैं उन्हें — जो सवाल उठाते हैं। वे एक घेरा बुनते हैं अपने चारों ओर, जहां सवाल उठाने वाले ही कटघरे में हों, बोलने न दें उन्हें, सवाल करने न दें उन्हें।
ऐसे हाल में भला परिवर्तन आए कैसे? पर यह स्वाभाविक है — क्योंकि यह लड़ाई है बेजुबानों की, उन मेहनतकश लोगों की जो खेतों में पसीना बहाना जानते हैं, कारखानों में काम करना जानते हैं, पर बोलना नहीं जानते। उन्होंने माना ही नहीं कि बोलने से कुछ होता है, वे जानते हैं — करने से होता है। और इसलिए जो उनके लिए बोलता है, उसे चुप कराना ज़रूरी समझा जाता है। क्योंकि जिस दिन ये बेजुबान बोलेंगे, उस दिन आज के बोलने वालों की लंका लग जाएगी। इसलिए बोलने वालों को पटाया जाता है, और जो पट नहीं सकते — उन्हें मिलता है अपमान का इनाम, और दुत्कार का सम्मान।

रचनाकार

सुरेन्द्र कुमार पटेल

ब्यौहारी, जिला शहडोल

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शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

मुक्तक

मुक्तक 

शोषण के ज़हर से
कुंडलनी और ग्रंथियाँ
सूख चुकी हैं
उनमें न रंध्रों के रिसाव हैं
और न ही जीवन के लिए झुकाव।
एक आदमी धोखा देता है
एक आदमी धोखा खाता है
एक आदमी और है
जो धोखे को चाव से उपजाता है
यही उसका परम साध्य है।
कहाँ गए घिसपिटू?
जो अत्याचार निरोधक गोलियाँ और चूर्ण
बड़े मज़े से बेचते हैं
देश की गरीबी उन्हें नहीं दिखती?
शिक्षा में लगा दीमक उन्हें दिखाई नहीं देता
इन्हें चाहिए केवल हिंसा-हिंसा-हिंसा।
रे मलधारी!
विषधारी!
क्यों उचारता है अहंकार की पोथी
नहीं पढ़ी क्या मानवता के पाठ
क्या घुन लग गया तेरी बुद्धि को?
तेरे शोषण की कोख में क्यों पलती हैं गालियाँ।
शोषण की तिजोरी में
खून और हिंसा की लपट ही पूँजी है
जीवन कटी पतंग की तरह
तिलमिला रहा है।
गरीबी के पेट में
शोषण के चाबुक की चोट है
गोल-गुम्बद की तरह
हम सत्ताधारियों के ही वोट हैं
गिने जाते हैं केवल पॉपुलेशन-रजिस्टर में
थमा दी जाती है हवा से बनी चूर्ण।
शोषण की चोट को
एक आदमी झेलता है
एक आदमी रेलता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो केवल अपनी फटी विवशता को सीता है
ये तीनों आदमी कौन हैं
मेरी भाषा मौन है
अरे! ये तो किसान, साहूकार और मज़दूर हैं।
मैं पूछता हूँ कि
क्यों नहीं जुगाड़ है
रोटी का मेरे देश में
क्यों बिलबिलाते हैं लोग
क्यों रोकर नसें सुखा रहे हैं
अपने अस्थिपंजर की।
इस प्रजातंत्र की पट्टी में
धोखे की लिट्टी है
बाँचते हैं अंधभक्त
बिना चोखे के ही
जो फिरंगियों के ही
वंशज हैं।
मैं पूछता हूँ
क्यों चुप है जनता
क्यों नहीं फूँकती
शोषणधारी कुर्सियों को।
क्यों निर्धनता की कोख में
भूख तीखी होती है
सूझती क्यों नहीं
जीवन की बारहखड़ी
ए.बी.सी. की टूटी पगडंडी में
ज़ेड बड़ी दूर है।
जनाब! पेट रोटी माँगता है
पेट के छेद में भूख रोती है
चाहे घुन शोषण की हो
या टोपीधारियों की
जोंक की तरह ये बम्बूधारी हो गए हैं।
मैं नहीं उगाता
अपनी कला के खेत में
शृंगार के दानों से अंकुरित
वासना की गंध।
शोषण के इस भूगोल में
गरीबी की जलवायु
उष्ण-सी हो गई है
क्यों कोई विवशता के मरुस्थल में
समानता के छायादार पेड़ नहीं लगाता।
भूख उपजाती है विद्रोह
और लाचारी
अब आशा की किरणें
धूमिल-सी पड़ गई हैं।
सत्ताधारी क्यों खेलते हैं
'बूझो तो जानें'
क्यों हाथ को पाँव
और पाँव को हाथ कहते हैं
क्यों निर्लज्जता की रेखाओं से
शोषण के भद्दे चित्र खींचते हैं।
मुर्दों की मशीन में
चिपके प्राण बोल रहे हैं
वे आज थोथे प्रजातंत्र की
पोल खोल रहे हैं
खोज रहे हैं सलीके की पगडंडी में
बुदबुदाते पानी के छींटे।
लोथ के चीथड़ों...
और मुर्दास्थलों की चिकचिकाती चिंगारियाँ
किसी रक्त-मानव ने दिए हैं
ये घाव...
हे संपोषक! शोषण को पहनाएगा सूती कफ़न क्या?
पानी की परतों में
निर्लज्जता के पेट फूल गए हैं
मन में चढ़ाया जाने वाला
आधुनिकता का घोल
बिल्कुल लाल लिटमस की तरह
पीला हो गया है।
पढ़ता हूँ मौन की भाषा
गरीबी के उखड़े शब्द
शोषण के पीड़ादायी संयुक्ताक्षर।
हाँ, तिलमिलाती अभिव्यक्ति के कोटर में
रक्तरंजित घाव फूट पड़े हैं
और नव-मानव के प्रतिस्थापन में
जैसे अक्षर से बने शब्द और शब्द से बने वाक्य चकमक हो गए हैं।
कुछ शेर हाथी हैं
और कुछ हाथी शेर नहीं हैं वाली
कहावतें छोड़िए
अ से आम नहीं
अधिकार माँगिए।
न जाने क्यों गरीबी की छुअन
इतनी तीखी है
कि भूख तिलमिल है;
मन के छेद से
नाभि की दूरी कितनी है।
क से कबूतर...
और ख से खरगोश...
पढ़ने पर ठीक है**
यदि ग से गाली पढ़ें
तो प्रलय की संभावना तीव्र होती है***
जो पेट पर लात मारते हैं
उन्हें गाली की भाषा ज़्यादा पोषण देती है।
चोट पत्थर की हो... या...**
जिह्वा की...**
दोनों दुधारी होते हैं...
इनकी धार से रक्त के लाल रंग नहीं
चित्तीदार डर बहते हैं
शोषण की पट्टिकाओं में किसी ने
पसीने की ओस को रौंदा है...
और दी हैं गंदी गालियाँ...
छीनी हैं साड़ियाँ...
लूटी है आबरू...
और फुलाया है दुर्गंधित मन को।

रचनाकार:
रजनीश कुमार जायसवाल
ग्राम+ पोस्ट : झारा, तहसील : सरई
जिला : सिंगरौली (म०प्र०)
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जब मनुष्यता भूल जाती है: कविता

जब मनुष्यता भूल जाती है



एक मनुष्य है —
जिसे बार-बार बताना पड़ता है,
क्या अर्थ होता है
मनुष्य होने का।

शिक्षक समझाते हैं,
संत पुकारते हैं,
माता-पिता दोहराते हैं —
कि हम सिर्फ़ शरीर नहीं,
हम संवेदना हैं।

पर कुछ लोग —
कभी नहीं सीखते।
वे नियम तोड़ते हैं,
सेतु जलाते हैं,
और दिखा देते हैं —
कि पशु अभी भी
हमारे भीतर जीवित है।

प्रकृति मुस्कराती है —
वह जानती है अपने बच्चों को।
वह डोर खींचती है,
और हम नाच उठते हैं
उसी पुराने पागलपन में।

हम दीवारें बनाते हैं,
वह उन्हें गिरा देती है —
हमारे ही हाथों से।

अब वह पशु
जंगलों में नहीं,
कुर्सियों पर बैठा है,
सूट पहनकर, आदेश देता है।

वे संस्थाएँ —
जो बनी थीं रक्षा के लिए,
अब बन गई हैं नियंत्रण के औज़ार।
जो क़ानून बराबरी के थे,
अब कुछ की सुरक्षा के हैं।

बाकी सब —
परिश्रम की चक्की में
हर दिन पिसते रहते हैं।

और मैं सोचता हूँ —
क्या प्रकृति जीत गई?
क्या उसने बस
हमारे भीतर छिपकर
अपना राज चलाया?

क्योंकि आज भी,
सभ्यता के आवरण में ढँका,
मनुष्य वही है —
जो कभी जंगलों में था।

सभ्य दिखते हैं,
पर जंगली हैं भीतर।
हम आज भी वही हैं —
बस रूप बदल गया है।

✍️ रचनाकार — सुरेन्द्र कुमार पटेल ब्यौहारी, जिला शहडोल
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सोमवार, जनवरी 12, 2026

कर उनकी जय -जयकार कलम तूं

कर उनकी जय-जयकार कलम तूं
लेखक की फोटो

कर उनकी जय-जयकार कलम तूं

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

सरहद पर जान गमाते जो।

जो मात्र भूमि के सच्चे सपूत हैं,

निज भाल से थाल सजाते जो।

अचल अथक कर्तव्य मार्ग पर,

हमरे सुख के खातिर जो।

अदम्य सुरमा भटमानी है,

रहते निडर मुखातिर जो।

बीवी बच्चों का मोह त्याग कर,

मातृधरणि से मोहे जो।

भारत माता का कर्ज चुकाने,

अनिमेष दृष्टि खल जोहे जो।

हे कलम, दुहाई उनको दे तू,

अग्रिम कतार में रहते जो।

आन, मान, सम्मान बचाने,

है क्षुधा-पिपासा सहते जो।

बलिदान हुए सीमा रक्षण में,

खल दल है मार गिराए जो।

माता के अखंड सुरक्षा हित,

दुश्मन की नींद उड़ाते जो।

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

पर स्वार्थ में स्वाहुति देते जो।

निज प्राण हथेली पर रखकर,

हमको हैं रक्षित करते जो।

विकट विपत्ति, काल, कलह पर,

निर्भय सेवा देते जो।

कहे सहोदर, वे कर्मवीर बन,

जन्मभूमि हित जीते जो।

कर उनकी जय-जयकार कलम तू,

देश भक्ति हित जीते जो।

रचनाकार — राम सहोदर पटेल
शिक्षक, हाई स्कूल नगनौडी
संकुल: आमडीह, जिला शहडोल, मध्यप्रदेश

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रविवार, जनवरी 11, 2026

अक्षर क्या है?

अक्षर क्या है?

अक्षर क्या है?

अक्षर ही सृष्टि का रहस्य है।

अक्षर से ही,
प्रकटा समाज का दृश्य है।

अक्षर से विहीन,
हिलता नहीं कोई पत्ता।

अक्षर ही तो है,
जो जग पर,
कायम कर रखी सत्ता।

वह परम सत्य है,
अविनाशी है,
आदि है और अंत भी।

अक्षर ही तो है,
जिसने मां मुख से गुरु मुख तक,
ज्ञान ज्योति जलाई।

सृष्टि की विविध रूप दिखाई।
चरम के परम को पाने में,
जीवन क्रीडा में धूम मचाई।

अक्षर ही तो है,
जब जन्मा था जग में,
ढोल-नगाड़े झंकार उठे।

जब अर्थी उठी, तब
"राम नाम सत्य है" के स्वर गूंजार उठे।

वह अक्षर ही तो है,
जिसने हम सबको,
संबंधों में बांधा है।

माता-पिता, भाई-बंधु सभी को,
देता अपनी कंधा है।

अक्षर ही तो है,
जो अजय है,
परम सहोदर है,
परम सत्य है।

कलमकार
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक", हाई स्कूल नगनौड़ी 
संकुल - आमडीह, जिला शहडोल, म.प्र.

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कविता: गणतंत्र दिवस

★ गणतंत्र दिवस ★


गणतंत्र दिवस की शुभ वेला में,
मैं तुम्हें बधाई देता हूं ।
यह अमूल्य समय जो दिया आपने,
धन्यवाद इसी पर देता हूं ।।

प्रेम मिलन का है यह दिन,
खुशियां बांटो सब मिलकर के ।
गणराज्य स्वराज को प्राप्त हुआ,
इस दिन को पूजो मन धोकर के ।।

स्वाधीन हुए हम पन्द्रह अगस्त को,
लेकिन अधिकार मिला इस दिन ।
संविधान बना कर भीमराव ने,
जनता के दूर किये दुर्दिन ।।

हमको यह खुशियां देने को,
कितने जाने बर्बाद हुए ।
पता नहीं यह हमको है,
कि कैसे हम आबाद हुए ।।

नि:स्वार्थ भाव थे उन पुरखों के,
प्रण अपना उनने पूर्ण किया ।
हमरे ही खुशियों के खातिर,
अपना सब कुछ होम दिया ।।

कर्तव्य हमारा अब क्या है,
कि उनका बोझ संभाले हम।
गणतंत्र कभी परतंत्र ना हो,
सौगंध आज ही खालें हम ।।

निज स्वारथ से ऊपर उठकर,
उपकार भाव दिखलाएं हम ।
सहयोग भाव को जागृत कर,
सभ्य समाज बनाए हम ।।

परनिंदा से दूर रहे,
अपने को छोटा ही समझे ।
बड़ाई अपना जो खुद करता,
उसको नीचा ही समझे ।।

बड़ा वही माना जाता,
उपकार पराया जो करता ।
दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करें,
व्यवहार नम्रता का करता ।।

पर चिंता की बात है यह,
गणतंत्र का अर्थ न माने कोई ।
मौका समझते भाषण बाजी का,
योग्यता बखाने हर कोई ।।

करें पराया पर्दाफाश,
अवसर अच्छा पावे इस दिन ।
बाकपटुता की होड़ लगाने का,
इच्छा जगती है इस दिन ।।

प्रभाव जमाये जनता पर,
जनसेवा का है ख्याल नहीं ।
रखो सहोदर रिश्ता सबसे,
क्या राष्ट्र भाव का ध्यान नहीं ।।
क्या राष्ट्र भाव का ध्यान नहीं ।।


✍️ कलमकार
राम सहोदर पटेल, शिक्षक
हाई स्कूल नगनौडी, संकुल - आमडीह
जिला शहडोल, मध्यप्रदेश

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शनिवार, जनवरी 10, 2026

दो कविताएं

🇮🇳 देश भक्ति गीत 🇮🇳

बर्बादी हम अपने देश की, नहीं देख सकते तनिकाय।
जो भी इस पर आंख उठाये, उसकी आंख निकालूं जाय।।
जिसका दाना हम हैं खाते, उस जन्म भूमि से प्रेम लगाय।
करेंगे रक्षा तन-मन-धन से, चाहे जान रहे या जाय।।
महाकाल से भी लड़ने को, हम नहीं कभी पिछाड़ी जाय।
हम उन पुरखों के बेटे हैं, बलिदान दिए जो मन हर्षाय।।
छोटा हमको मत समझे कोई, मेरी बात सुनो चितलाय।
अग्निपुंज के हम अंगारे, क्षण में दुश्मन दउं जलाय।।
भारत मां ने पालन करके, हमको ऐसा दिओ बनाय।
युद्ध भूमि में हम अड़ जाएं, तो शत्रु का लगे ठिकाना नाय।।
प्राण से बढ़कर है यह भारत, जननी बात कही समझाय।
कहे सहोदर भारत माता, पाला हमको ध्यान लगाय।।

🌿 दुर्जन इंसान 🌿

साधु असाधु कहावत हैं,
जब चले कुमारग आन बिसारिके।
शान बनावन चाहत रे नर,
पर कैसे बने सत्संग बिगारिके।।
बुद्धि विवेक ना काम करें,
नहिं मान बचे भय जन बल धन के।
संत समाज ना नीक लगे,

जब राह चले असमाजिकता के।।
मैत्री भाव बुरो लागत है,
मन भावत है अभिमानन के।
नभ देख चलैं न नवैं कतहू,
अकड़ाय जपत अभिमानन के।।
बात करत न बनै इनसे,
जिन दुर्जन वृत्ति विकाय मना के।
दूरहि ते टकरावन चाहत,
चलन पड़त निज मान बचाय के।।
हित बात लगे विपरीत इन्हें,
उल्टा करैं बात बड़ाय बड़ा के।
ज्यों पाहन पतित बान नहिं लागत,
उल्टे सर नोकहिं देत नशाय के।।
इनकी यदि स्वारथ सिद्धि हुई नहिं,
तो अभियान करत बड़ कोप दिखाय के।
विषधर अनुरूप स्वभाव सदा,
रहियो इनसे निज जान बचाय के।।
बचकर रहिए इनसे हरदम,
संगत इनकी नहिं जाहु जनाय के।
भाव सहोदर सम रखियो,
चलियो निज राह बनाय बनाय के।।

✍️ राम सहोदर पटेल, "शिक्षक"
हाई स्कूल नगनौडी संकुल
आमडीह, जिला शहडोल।

शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

कविता: मेरा भारत महान



जिसकी मनमोहक सुबह, और सुहावनी शाम है।
विश्वगुरु, यशवान, सूरज-सा — भारत मेरा महान है।
विश्व-प्रसिद्ध नाम इसका, पौरुष बनी पहचान है।
सांस्कृतिक हो या प्राकृतिक, प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान है।
आर्यावर्त है नाम पुरातन, विश्व-विदित सम्मान है।
दुष्यंतपुत्र भरत से भारत, नामकरण सरनाम है।
रहा अग्रणी युग-युगों से यह, सभी करें गुणगान है।
ऊँचा गौरव, इतिहास अग्रणी — किया जगत कल्याण है।
अवतार विधाता लेकर इसको, दिया विजय वरदान है।
शत्रु न टिकता इसके आगे, दुर्जेय पराक्रमी महान है।
महान उद्यमी, उन्नत विचारक — कृषि में यह प्रधान है।
नव-तकनीकी हरित क्रांति से, सजा खेत-खलिहान है।
विभिन्न संस्कृतियाँ होने पर भी, एक ही नियम-विधान है।
किए कुशासन मुगल-फिरंगी, फिर भी दिया सम्मान है।
स्वागत में हम आगे हरदम, कभी न किया अपमान है।
कला, शिल्प, संगीत, नृत्य में — सदा शिखर पर नाम है।
समान नियम-कानून है अपना, बना एक संविधान है।
सबको है अधिकार बराबर, कर्तव्य में सभी समान हैं।
धर्म है ऐच्छिक — जो भी माने, जिसका जिस पर ध्यान है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भी, भारत का स्थान है।
कंप्यूटर उपलब्धियों में आगे, मिला इसे पहचान है।
तीव्र अग्रणी काम हो रहे, डिजिटल अब अरमान है।
शिर पर मुकुट हिमालय बनकर, होता शोभामान है।
बहे शुद्ध निर्मल जल नदियाँ, फैले खेत-खलिहान हैं।
अदम्य साहसी नेता सुभाष ने, दिया अभय वरदान है।
किया स्वतंत्र, अखंड बनाया — सरदार पटेल महान हैं।
राष्ट्रभाषा हिंदी है इसकी, माने कोटि संतान हैं।
‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत और ‘जन-गण-मन’ ही गान है।
जानो, पक्षी मयूर राष्ट्र का, पशु बाघ बलवान है।
राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र, तिरंगा ध्वज सम्मान है।
जितना लिखूँ उतना ही कम है, है मुश्किल गौरव-गान है।
मेहनत, लगन, वफादारी से, यह पाया गौरवमान है।
धरती इसकी सोना उगले, करें पेड़ फलदान हैं।
सहोदर सिंधु चरण पखारे, पसरे सौख्य-निधान है।।
                     *रचनाकार*
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक", हाई स्कूल नगनौडी।
संकुल -आमडीह, जिला शहडोल मध्यप्रदेश।

मंगलवार, जनवरी 06, 2026

दो कविताएं


 दो कविताएं

1. पाखण्ड
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
देवी-देवताओं की गणना हज़ार है,
बारी-बारी से ये पा रहे सत्कार हैं।
​जीवित देवों को कोई पूजे ना,
घर में बूढ़ों को कोई पूछे ना।
तड़पें दादा-दादी एक घूँट पानी को,
पति भी न रोक सके पत्नी की मनमानी को।
​पत्थर की मूरत कर रही शृंगार है,
मात-पिता का होवे ना सत्कार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​सबका अपना-अपना यह उद्योग है,
मंदिर की मूर्ति करे सुख-भोग है।
पाखंडों का दरबार सजाएँ फूलों से,
माखन-मिश्री, दाख चखाएँ झूलों से।
​इन पर न शिक्षा का असर है,
आडंबर में भूल गए संसार हैं।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।
​मुर्गे व पशुओं को काट रहे कुर्बानी में,
मुर्दे को भी दान देते नादानी में।
अंधविश्वास पनपता इनकी दीवानगी में,
बने रहें पिछलग्गू आना-जानी में।
​पाखंड ने मिटाया संस्कार है,
सहोदर भाव जगाए शुभ आचार है।
भारत में पाखंड का बाज़ार है,
सदियों से चल रहा व्यापार है।

 2. शिक्षा का सार

​पढ़ाई न हो तो यह जीवन बेकार,
ज्यों उजाले बिना ऊँचा महल बेकार।
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार,
ज्यों सलिला (जल) बिन ताल-सरिता निस्सार।
​अक्लमंदी बिना सकल जीवन दुश्वार,
साक्षरता बिन जीवन जाए मच्छर सा मार।
पशु तुल्य जीवन बने बिना शिक्षा के यार,
अक्षर-दीपक से महके यह सकल संसार।
​ज्यों भानु-उदय से अंधेरा हो फरार,
निरक्षरता का यदि छाया रहे अंधकार।
ना हो जीवन सुखी, पड़े आपद की मार,
ज्ञान-दीप की लौ जले जब मन में अपार।
महके तब जीवन में खुशियाँ साकार,
चौतरफा विकास ही शिक्षा का है सार।
सुख चाहो अगर, करो शिक्षा से प्यार,
सूर, तुलसी, कबीरा हुए अमर संसार।
​शिक्षा ही खोलती सफलता का द्वार,
शिक्षा बिना न हो प्रगति का आधार।
अशिक्षा के कारण आई फिरंगी सरकार,
जैसे ही शिक्षा जगी, देश हुआ वापस हमार।
​शिक्षा का पाया न कोई भी पार,
अगर शिक्षा सधी, तो सधा सारा संसार।
शिक्षा बिना न मिले मान, गौरव और प्यार,
सहोदर कहे—पढ़ना ही है जीवन का सार।


कलमकार 
     ========
राम सहोदर पटेल, "शिक्षक" 
हाई स्कूल नगनौडी संकुल -आमडीह, जिला - शहडोल, मध्यप्रदेश।


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